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शिक्षा में सृजनशीलता का प्रश्न और मौजूदा व्यवस्था भाग 16

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शिक्षा में सृजनशीलता का प्रश्न और मौजूदा व्यवस्था पर महेश चन्द्र पुनेठा का यह लेख किश्तों में प्रकाशित किया जा रह है, श्री पुनेठा मूल रूप से शिक्षक है, और शिक्षा के सवालो को उठाते रहते है । इनका आलोक प्रकाशन, इलाहाबाद द्वारा ”  भय अतल में ” नाम से एक कविता संग्रह  प्रकाशित हुआ है । श्री पुनेठा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों द्वारा जन चेतना के विकास कार्य में गहरी अभिरूचि रखते है । देश के अलग अलग कोने से प्रकाशित हो रही साहित्यिक पत्र पत्रिकाओ में उनके 100 से अधिक लेख, कविताए प्रकाशित हो चुके है ।

बच्चे को फेल करना कोई समाधान नहीं

शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 के तहत प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने तक बच्चे को किसी कक्षा में न रोकने का प्रावधान किया था, जिसे वर्तमान सरकार ने पलट दिया है। बाल मनोविज्ञान की दृष्टि से फेल न करने का प्रावधान एक सही फैसला था। भले ही अधिकांश शिक्षक-अभिभावकों में इस प्रावधान को लेकर नाराजगी थी। वे इसे सही नहीं मानते थे। उनके तर्क थे कि इससे बच्चे की नींव कमजोर हो जाती है, बच्चा पढ़ने-लिखने में ध्यान नहीं देता है, बच्चे में आगे के जीवन में संघर्ष की योग्यता नहीं विकसित हो पाती है, शिक्षक कामचोरी करते हैं आदि-आदि। दरअसल ये सारे तर्क शिक्षा की गलत समझ से पैदा हुए तर्क हैं। आज शिक्षा को परीक्षा तक सीमित कर दिया गया है। ‘पास-फेल’ प्रणाली के चलते सीखने-सिखाने पूरी की प्रक्रिया परीक्षा केंद्रित हो गई है, जबकि उसे ज्ञान निर्माण की दिशा में होना चाहिए था। बच्चा पास होने के लिए पढ़ता है तो शिक्षक पास करवाने के लिए पढ़ाता है, फलस्वरूप उसी विषय तथा विषयवस्तु पर अधिक बल दिया जाता है, जो परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण होती है। बच्चा उस महत्वपूर्ण को रट लेता है। जो रट नहीं पाता है, वह नकल ले जाकर परीक्षा पुस्तिका को भरने का काम करता है। समझने पर बहुत कम बल होता है। परीक्षा का उद्देश्य बच्चों की छंटनी करना या उनका वर्गीकरण करना हो गया है, जबकि परीक्षा का असली उद्देश्य बच्चे व शिक्षक दोनों के लिए स्वमूल्यांकन करना है अर्थात बच्चे को यह पता चले कि वह क्या सीखने में पीछे रह गया है और शिक्षक क्या सिखाने में, ताकि बच्चे सीखने के और शिक्षक सिखाने के नए तरीके खोज सकें।

आज पढ़ाने का मतलब परीक्षा उत्तीर्ण करने तथा अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए तैयार करना मात्र हो गया है। फलस्वरूप अध्ययन और अध्यापन का कार्य परीक्षा के चारों ओर केंद्रित होकर रह गया है। लगता है कि यदि फेल-पास का प्रावधान नहीं होगा तो पढ़ने वाला क्यों पढ़ेगा और क्यां पढ़ाने वाला पढ़ाएगा? इस सोच ने फेल करने को शिक्षा की एक अनिवार्य जरूरत बना दिया है। लोगों का मानना है कि बच्चे को किसी कक्षा में न रोकने के प्रावधान से बच्चे का भविष्य बिगड़ सकता है। जबकि वास्तविकता यह है कि ‘फेल’ करने से बच्चे का भविष्य बिगड़ता है। फेल शब्द बच्चे को तोड़ने, हताश, निराश व कुंठित करने का काम करता है। बच्चा हतोत्साहित होता है। कभी-कभी यह हताशा-निराशा-कुंठा उसे आत्महत्या तक पहुँचा देती है। फेल होने से बच्चे के भीतर खुद को लेकर हीनता का बोध पैदा होता है। वह अपनी ही नजर में गिर जाता है। उसका आत्मविश्वास बुरी तरह लड़खड़ाता है। ऐसा होना बच्चे की सीखने की गति को प्रभावित करता है। फेल का भय हमेशा बच्चे को दबाब व तनाव देता है जिससे वह सहज गति से सीख नहीं पाता है। पढ़ने-लिखने का आनंद नहीं प्राप्त कर पाता है। विशेषरूप से परीक्षा के दिन तो बच्चे के लिए तनाव के दिन बन जाते हैं। भय चाहे डंडे का हो या परीक्षा या किसी और का, सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है। सीखने की गति को मंद या बाधित कर देता है। सीखने के लिए जरूरी है कि बच्चे की विषयवस्तु के प्रति रूचि हो तथा वह उसे सीखना चाहता हो। एक वर्ष से अधिक एक ही कक्षा में बैठने पर उसकी रूचि उस विषयवस्तु के प्रति नहीं रह जाती है। वह अपने से कम उम्र के बच्चों के बीच खुद को असहज महसूस करता है। कक्षा में ऊब पैदा होना उसके लिए स्वाभाविक है। ऐसे में बच्चा कुछ नया सीखने के बजाय और पीछे को जाता है। इसलिए यह तर्क सही नहीं है कि बच्चे को फेल करने से उसकी नींव मजबूत होती है। यह कपोलकल्पित धारणा है। इस पर अभी तक कोई ठोस अध्ययन सामने नहीं आया है। यह मेरा अनुभवजनित सत्य है कि एक वर्ष फेल कर देने पर भी यदि बच्चे में अतिरिक्त ध्यान नहीं दिया जाता है तथा शिक्षण के तरीकों में किसी तरह का बदलाव नहीं किया जाता है तो बच्चे में सुधार की कम ही संभावना होती है। जिस बच्चे की सीखने की गति कम है, उसे फेल करने की नहीं बल्कि उस पर अतिरिक्त ध्यान देने और सिखाने के तरीकों में बदलाव करने की आवश्यकता होती है। यदि कमजोर बच्चे को अगली कक्षा में भेजते हुए अतिरिक्त ध्यान दिया जाय तथा शिक्षक अपने सिखाने के तरीकों में परिवर्तन करते हुए विषयवस्तु के प्रति लगाव व रूचि पैदा करे तो उसके सीखने की गति में अवश्य वृद्धि की जा सकती है। यदि बच्चे की पढ़ाई में रूचि होती है तो उसके लिए परीक्षा में पास या फेल होने के प्रावधान का कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता है। क्योकि वह पास होने के लिए नहीं बल्कि जानने-समझने की इच्छा से पढ़ता हैं। उसे ऐसा करने में आनंद प्राप्त होता है। उसे यह अपनी जरूरत लगती है। दरअसल जो बच्चे पढ़ने में तेज होते हैं ,वे इसलिए तेज नहीं होते हैं कि उन्हें परीक्षा का भय होता है, बल्कि उनको पढ़ने-लिखने में आनंद आता है और पढ़ना-लिखना उन्हें अपने भविष्य के लिए जरूरी लगता है। वह पुस्तकों के द्वारा देश-दुनिया को जानना चाहते हैं।

यह देखा गया है कि बच्चे की पढ़ने-लिखने के प्रति ललक तभी बनी रहती है, जब वह सफल होता रहता है। असफलता उसको हतोत्साहित करती है। एक ही कक्षा में बार-बार पढ़ना उसे ऊबाउ प्रतीत होता है। उसके साथी उससे छूट जाते हैं। अपने से छोटे वय वर्ग के साथियों से तालमेल बैठाना उसके लिए आसान नहीं होता है।
फेल नहीं करने का मतलब यह भी कहीं नहीं था कि बच्चे को पढ़ाया नहीं जाएगा अर्थात पढ़ाए बिना अगली कक्षा में रख दिया जाएगा। ’पास-फेल’नहीं होगा तो बच्चा अपनी जरूरत ,रूचि और आनंद के लिए पढ़ेगा। पढ़ने-लिखने का उद्देश्य बदल जाएगा। अध्ययन-अध्यापन की दिशा बदल जाएगी। क्या केवल परीक्षा पास करने के लिए या अधिक अंक प्राप्त करने के लिए पढ़ाया जाना बच्चे के भविष्य को अंधकारमय नहीं बनाता है? जैसा कि आज दिखाई दे रहा है-हम पाते हैं कि बहुत सारे बच्चे प्रमाणपत्रों में तो अब्बल होते हैं लेकिन जीवन में आने वाली समस्याओं के समक्ष घुटने टेकू। आज ऐसे अनेक उदाहरण हमें देखने को मिलते हैं कि िंहंदी से स्नातकोत्तर किए हुए एक औपचारिक पत्र ठीक से नहीं लिख पाते हैं या छोटा सा निबंध या लेख लिखने में उनके पसीने छूट जाते हैं। इसी तरह भौतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर अपने घर के छोटे-मोटे विद्युत संयंत्र ठीक नहीं कर पाते हैं। यह है हमारी ‘पास-फेल’ केंद्रित शिक्षा पद्धति का खामियाजा। इस बात की कोई गारंटी नहीं कि ‘पास-फेल’ प्रणाली से आगे बढ़ा बच्चा योग्य ही होता है।

अनुभव बताते हैं कि किसी कक्षा में रोके गए बच्चों में से बहुत कम बच्चे ऐसे होते हैं, जो आगे बेहतर कर पाते हैं, उन्हें अपवाद ही माना जाय तो गलत नहीं होगा। और वह जो बेहतर कर पाते हैं उन्हें यदि आंशिक मार्गदर्शन के साथ आगे भी बढ़ा दिया जाता तो तब भी बेहतर ही करते। यह मानना किसी भ्रम से कम नहीं है कि फेल करने से ही वे बच्चे बेहतर कर पाए। आगे बेहतर करेगा या उसमें सुधार करेगा, इस आशा में बच्चे को एक और साल किसी कक्षा में रोकना ठीक नहीं है। अगली कक्षा में भेज कर उसका उपचारात्मक शिक्षण करते हुए भी यह काम किया जा सकता है। उसमें अतिरिक्त ध्यान देने की जरूरत है न कि फेल करने की।
जहाँ तक असफलताओं से सीखने और असफलताओं में पड़कर मजबूत होने का सवाल है, उसके लिए जीवन में अभी बहुत समय होता है। बचपन में ही बच्चे को ऐसे आघातों में नहीं डाला जाना चाहिए क्योंकि बालमन बहुत कोमल होता है, हल्की सी खरोंच भी वहाँ गहरा घाव करती हैं। वह नवोद्भिद की तरह होता है। क्या किसी नवोद्भिद को आगे की मजबूती के तर्क पर लू, पाले या ओलावृष्टि के हवाले होने देना चाहिए? बच्चा जब दुनिया को समझने लगे, भावनात्मक रूप से मजबूत हो जाय तब उसका मार्गदर्शन करते हुए उसे असफलता को सहने के लिए तैयार किया जा सकता है।

कुछ लोग तर्क देते हैं कि इस फेल-पास वाली शिक्षा व्यवस्था से ही निकलकर बच्चे आई.ए.एस., पी.सी.एस., डॉक्टर, इंजीनियर जैसे बड़े पदों पर पहुँचे,यह सही है लेकिन वे भूल जाते हैं कि ये बच्चे वे नहीं थे जो फेल हुए थे। खोज-खबर तो उनकी लेनी है जो फेल हुए, उनका क्या हुआ? वे कहाँ पहुँचे? कितने थे जो फेल होने की हताशा-निराशा-कुंठा से निकलकर जीवन में कुछ सार्थक कर पाए? यह जानने की जरूरत है तब पता चल पाएगा कि फेल होने का दंश कितना गहरा होता है?

कुछ यह भी तर्क देते हैं कि हर बच्चे का मानसिक स्तर समान नहीं होता है इसलिए कम मानसिक स्तर वालो बच्चों को फेल किया जाना चाहिए। पर सवाल है-क्या फेल करने से मानसिक स्तर समान हो जाता है? मानसिक स्तर तो सभी पास होने वालों का भी समान नहीं होता है। मानसिक स्तर का समान न होना फेल होने को कैसे जायज ठहराता है ,यह समझ से परे है।

दरअसल बच्चे का फेल होना स्कूल का फेल होना है। हमारी शिक्षा व्यवस्था का फेल होना है। यदि स्कूली व्यवस्था चुस्त-दुरूस्त हो तो कोई बच्चा फेल हो ही नहीं सकता है। यदि एक सामान्य बच्चा असफल होता है तो इसकी जिम्मेदारी अभिभावक-शिक्षक और समाज की है। एक ऐसा बच्चा जो अपने जीवन की सारी गतिविधियां सामान्य रूप से संपादित करता है, समाज से भाषा सीख लेता है , अन्य आदतें और काम सीखता है तथा सबके साथ सामान्य व्यवहार करता है, तब यह तो कतई नहीं कहा जा सकता है कि उसमें सीखने की क्षमता नहीं है। यदि वह स्कूली पाठ्यक्रम को सीखने में पीछे रह जाता है तो देखना पड़ेगा कि दिक्कत कहाँ है, किन कारणों से बच्चा उसे सीख नहीं पा रहा है? परिवार-पड़ोस तथा स्कूल ने इस दशा में क्या किया? फेल करना उसका कोई समाधान नहीं है।

यह भी विचारणीय है कि हमारी परीक्षा पद्धति प्रश्न पत्र में दिए कुछ प्रश्नों के न आने के आधार पर एक बच्चे को असफल घोषित कर देती है। यह भी तो हो सकता है कि बच्चे को प्रश्न पत्र में पूछे गए प्रश्नों के अलावा अन्य बहुत कुछ आता हो। हमारी परीक्षा पद्धति में इस बात के मूल्यांकन के लिए कोई व्यवस्था नहीं है कि बच्चे को प्रश्नपत्र से बाहर क्या-क्या आता है? इस पद्धति के अंतर्गत जो बच्चा सफल भी होता है उसके लिए यह दावा नहीं किया जा सकता है कि उसको, प्रश्न पत्र से बाहर उसके पाठ्यक्रम में जो कुछ भी है, वह सब आता है। यह भी तो संभव है कि जो प्रश्नपत्र में है वह उसे पता हो या उसने रटा हो या नकल किया हो लेकिन उससे बाहर उसे कुछ न आता हो।

क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि ‘पास-फेल’ की इस प्रणाली को केवल प्रारंभिक स्तर से ही नहीं बल्कि पूरी शिक्षा से हटा दिया जाय? बच्चे स्कूल आएं ,पढे़ और चले जाएं। परीक्षा स्वास्थ्य परीक्षण की तरह स्वैच्छिक हों जिसको जरूरत हो बैठे अन्यथा नहीं।

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