हेमराज सिंह चौहान

मुझसे एक बार एक टिकटैक के दौरान अल्मोड़ा- पिथौरागढ़ के सांसद अजय टम्टा ने कहा था कि उत्तराखंड(पहाड़) में जातिवाद ख़त्म हो चुका है और सब यहाँ मिलकर रहते हैं. मेरे टोकने पर उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी इससे दूर है. मैं तब चौंका भी था क्योंकि वो इसी वर्ग से आते हैं. वो सासंद इसलिए बने कि क्योंकि उनका संसदीय क्षेत्र अनुसूचित जाति के लिए रिज़र्व है. वो अभी भी सत्तारूढ़ पार्टी के सासंद है.

दरअसल ये टिकटैक मैंने उनसे साल 2016 में बागेश्वर के पास हुई एक ख़ौफ़नाक घटना के बाद किया था. तब एक ब्राहमण ने एक दलित की हत्या इसलिए कर दी थी क्योंकि उसने उसके अनाज को छू लिया था.

सोशल मीडिया में हल्द्वानी के निकट बिंदुखत्ता का एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें एक महिला एक शख्स को उसकी ही ज़मीन पर इसलिए काम नहीं क़रवाने दे रही है क्योंकि वो शख्स दलित है. वो उसे उसे बार-बार बता रही है कि वो हरिजन है इसलिए वो यहाँ ज़मीन पर मकान नहीं बना सकता है. वो महिला इस वीडियो में कहती सुनाई दे रही हैं कि यहाँ आसपास ब्राह्मण रहते हैं. वो यहां ज़मीन नहीं ले सकते है.

पूरे पहाड़ में भयंकर तौर पर जातिवाद का बोलबाला है. सामाजिक तौर पर इसे मान्यता मिली है इसलिए ऐसे मामले कम आते हैं और हमें लगता है कि जातिवाद ख़त्म हो चुका है.

इसका ज़िम्मेदार खुद दलित भी है ख़ासकर वो जिसके पास संसाधन और शिक्षा भी है. वो अपने समुदाय के हितों की बात नहीं करता है.

उससे एक दूरी बना लेता है ताकि एलीट क्लास में जगह पा सके। उसे अपने नायक डॉ भीमराव अंबेडकर, ज्योतिबा फूले और सावित्रीबाई से कोई वास्ता नहीं है. वो बस खुद सवर्णों के बीच एडजस्ट करने के लिए आडंबर करता है. ऐसे में इस तबके के साथ कौन खड़ा होगा. जो संविधान और उसके अधिकारों का हितैषी है और जानकार भी. पहली लड़ाई उसे खुद से लड़नी होगी तब वो अन्य तबके के लोगों को अपने साथ खड़ा कर पाएगा जो जातिवाद की बेड़ियों से मुक्त हैं.

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