रामनगर सेे सलीम मलिक की रिपोर्ट ।

उत्तराखंड सरकार द्वारा पंचायत चुनाव में दो बच्चों से अधिक वाले लोगों व हाईस्कूल पास की बाध्यता के खिलाफ तथा वन गांवों को पंचायत प्रतिनिधि चुनाव का मौका दिये जाने की मांग को लेकर आयोजित कन्वेंशन में वक्ताओं ने पंचायत अधिनियम को ही सवालों के घेरे में रखते हुए समाज के कमजोर वर्गों के लिए साजिश करार दिया। इसके साथ ही पंचायत चुनाव के नामांकन प्रक्रिया से पूर्व राज्य के सभी तहसील मुख्यालयो पर वर्तमान पंचायत अधिनियम के विरोध में धरना-प्रदर्शन का आह्वान भी किया गया। समाजवादी लोकमंच के तत्वाधान में रविवार को पैंठपड़ाव में ललित उप्रेती और कौशल्या के संयुक्त संचालन में सम्पन्न कन्वेंशन के दौरान उत्तराखंड के अलावा उत्तर-प्रदेश, दिल्ली आदि राज्यों से लोगों ने हिस्सा लिया। मुख्य वक्ता सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता रविन्द्र गढ़िया ने पंचायत अधिनियम को कमजोर वर्गों का हक छिनने वाला बताने के साथ ही इसको पंचायतों की आंतरिक शक्ति कम करने वाला कानून करार दिया। श्री गढ़िया ने संविधान द्वारा नागरिकों को दिये गये मौलिक अधिकारों पर चर्चा करते हुए कहा कि मौलिक अधिकारों के हनन के प्रति सरकार की कोई जवाबदेही न होने के कारण नागरिकों के मौलिक अधिकारों को देश भर में खुलेआम कुचला जा रहा है। दिल्ली हाईकोर्ट के अधिवक्ता कमलेश ने पंचायत अधिनियम द्वारा पहले से ही योग्यता के निर्धारण को लोकतंत्र को संकुचित करने की कोशिश बताते हुए कहा कि कानून की आड़ लेकर जनता के एक हिस्से को चुनाव में हिस्सेदारी करने से रोकने वाली सरकार को इस बात का जवाब देना चाहिए कि अगर अनपढ़ आदमी छोटी सी पंचायत चलाने में अक्षम है तो वह लोकसभा और विधायक जा चुनाव लड़कर इतने बड़े राज्य और पूरे देश का शासन चलाने में सक्षम कैसे ही सकता है। मुनीष कुमार ने लोगों के अनपढ़ होने पर सरकार को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि सरकार देश के सभी नागरिकों को शिक्षा मुहैया कराने में विफल रही है तो सजा खामियाजा जनता को क्यों भुगतना चाहिए। उन्होंने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि एक तरफ सरकार अनपढ़ लोगों को अयोग्य मानकर उन्हें चुनाव लड़ने से रोकना चाहती है तो दूसरी ओर आबादी के बहुत बड़े हिस्से को अनपढ़ बनाये रखने के लिए एक लाख स्कूल भी बन्द करने जा रही है। देवरिया से आये चतुरानन ओझा ने आरोप लगाया कि पंचायतों के अधीन 29 विभाग होने के बाद भी पंचायतों के सारे निर्णय पिछले दरवाजे से नौकरशाही द्वारा लेकर पंचायतों पर थोप दिये जाते हैं। उन्होंने पंचायतों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए रक्षात्मक की अपेक्षा आक्रामक ढंग से लड़ाई लड़ने का आह्वान करते हुए कहा कि पंचायतों को अधिकार सम्पन्न बनाये जाने के साथ-साथ सरकार द्वारा न्याय पंचायतों को खत्म करने की साजिश के खिलाफ भी जनता को मोर्चा खोलना होगा। कन्वेंशन में वक्ताओं द्वारा यह भी सुझाव दिया गया कि यदि सरकार लोगों के चुने जाने व चुनने के अधिकार का हनन करती है तो लोगों को ऐसे पंचायत चुनाव का बहिष्कार कर अपना जनचुनाव आयोग गठन कर समानांतर जनपंचायतों का गठन कर सरकार को इनको मान्यता दिये जाने के लिए मजबूर करना चाहिए। कन्वेंशन को मुख्य तौर पर पर हरिद्वार के मीर हम्जा, तरुण जोशी, मौ. शफी, शाइस्ता बेगम,मनोहर सिंह, प्रेमराम, केसर राणा आदि ने संबोधित किया। इस मौके पर गिरीश आर्य, वेदप्रकाश, महेश जोशी, किशन शर्मा, ललिता रावत, सरस्वती जोशी, मनमोहन अग्रवाल, बालकिशन चैधरी आदि मौजूद रहे।