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Almora-साहित्यकारों की नजरों में अल्मोड़ा – भाग 1

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कपिलेश भोज

Almora में राहुल सांकृत्यायन
विख्यात हिन्दी लेखक और इतिहासकार राहुल सांकृत्यायन (9 अप्रैल, 1893—14 अप्रैल,1963) नैनीताल व भवाली होते हुए 25 मई, 1950 को अल्मोड़ा पहुँचे थे।

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25 व 26 मई को अल्मोड़ा में रह कर फिर वे 27 मई को कटारमल , बैजनाथ और बागेश्वर की यात्रा के लिए आगे बढ़ गए थे ।
अपने Almora- भ्रमण के अनुभव उन्होंने इस प्रकार दर्ज किए हैं –
” कत्यूरी कुमाऊँ का प्रथम ऐतिहासिक राजवंश है। कुमाऊँ के इतिहास पर लेखनी चलाते समय कत्यूरियों के पुराने अवशेषों को देखना आवश्यक है , यही सोच हमने मई के अन्तिम सप्ताह में कत्यूर पट्टी की यात्रा की।

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हमारे साथी थे श्री प्रभाकर माचवे। समानधर्मा आदमी के साथ यात्रा करने में कितना आनन्द आता है, यह कहने की आवश्यकता नहीं।
Almora नया नगर है। 1560 से ही उसे कुमाऊँ की राजधानी बनने का सभाग्य प्राप्त हुआ , किन्तु कत्यूरी काल (9 वीं से 12 वीं शती) में भी खगमारा का दुर्ग मौजूद था।


अल्मोड़ा पहुँच कर बिना ढूँढन व्रत पूरा किए कैसे रहा जा सकता था। यशपाल भी यहीं थे। माचवे, वह और मैं तीन साहित्यकार हो गए। तरुण वकील श्री हरिश्चन्द्र जोशी की तो इस यात्रा में बड़ी सहायता रही। वह कत्यूर (बैजनाथ) तक साथ गए। श्री लक्ष्मीदत्त जोशी के घर-जिन्हें वकील होने पर भी लोगों ने सेठ बना रखा है-उसी शाम को पहुँचे। उन्होंने कुमाऊँ के धर्म – गीतों तथा हस्तलेखों के साथ कितनी ही पुरानी कला की वस्तुओं का अच्छा संग्रह कर रखा है। किन्तु उस दिन वह घर पर नहीं थे। दूसरे दिन हमें चाय-पान के साथ उनके संग्रह को देख कर अति सन्तोष हुआ।

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अगले दिन कितने ही मन्दिरों और पुराने स्थानों को देखने गए , किन्तु पहली शाम को जो त्रिपुरसुन्दरी (त्रिपुरा) मन्दिर के दर्शन का फल प्राप्त हुआ , वह दुहराया नहीं जा सका। यह मन्दिर दो- तीन ही शताब्दी पुराना है , किन्तु नए मन्दिर तथा देवताओं के वृक्ष- चबूतरे हमारे देश में असली महात्तम वाली मूर्तियों के स्वाभाविक म्यूजियम होते हैं। इसलिए हम त्रिपुरसुन्दरी की ओर घूम ही पड़े। दक्षिणा उपस्थित हो, और स्थानीय परिचित सहायक मिलें, तो भगवान का द्वार भी खुल जाता है। अँधेरा था, टार्च से कोने में देखा तो कुछ शिलाखण्ड दिखाई पड़े- शिलाखण्ड नहीं, वह तो रत्न साबित हुए। यह उस समय की खण्डित मूर्तियाँ थीं, जब कि हमारे देश में मूर्तिशिल्प पर महमूद के आक्रमण (11 वीं शती के आरम्भ) के बाद वाला विश्वकर्मा का शाप नहीं पड़ा था।


26 मई का सारा दिन अल्मोड़ा के लिए था । सवेरे से ही निकल पड़े , त्रिपुरा के मन्दिर में पहुँच कर सपार्षदि विष्णु के चार शिलाखण्डों को बाहर निकाल लाए। इसी समय पुजारिन वहाँ से खिसक गई। साथियों ने भय करना शुरू किया, कहीं बुढ़िया को यह पसन्द न आया हो और वह गोहार के लिए न गई हो। मैंने कहा – परवाह नहीं , जब तक गोहार आएगी तब तक ब्राण्ड न्यू रोलफ्लेक्स अपना काम कर चुका रहेगा। बुढ़िया आई तो देखा, उस के शरीर पर धराऊँ अच्छे कपड़े हैं। वह अपना फोटो उतरवाना चाहती थी। हमारे आनन्द का क्या कहना, अन्धे को चाहिए दो आँखें ही न।

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मैंने कहा- माई, तू भी बैठ जा देवता के साथ। बुढ़िया का भी विष्णु भगवान के साथ चित्र उतर गया। इस नवीं – दसवीं शती की भव्य मूर्ति को विष्णु कहना जरा साहस का काम है, क्योंकि पास में पड़ा चक्र तथा पार्षद के ऊपर की शंख हो सकता है, किसी दूसरी मूर्ति के हों।

मूर्ति काले पत्थर की है, अंग – प्रत्यंग को बड़े कौशल के साथ बनाया गया है। किसी भव्य मन्दिर के अधिष्ठाता के तौर पर इसे कहीं प्रतिष्ठित किया गया था। 14 वीं, 16 वीं और 18 वीं शती (दो बार) में चार बार मूर्ति-भंजकों के अभियान कूर्मांचल पर हुए। वह यदि पहली ही बार नृशंसता का शिकार हो गया होगा-इतनी सुन्दर कला के प्रतीक को देख कर जिस हृदय पर कोई प्रभाव न हो, उसे आततायी का हृदय कहना चाहिए।

नातिदूर नैनादेवी दीपचन्देश्वर मन्दिर है। इसे राजा दीपचन्द्र (1748 – 77) ने कला और सुरुचि के नितान्त अवसाद के समय बनवाया था। मन्दिर की दीवारों के बाहरी निचले भाग पर बहुत ही भद्दे तथा अश्लील ‘चौरासी आसान’ उत्कीर्ण हैं, जो धर्म की तत्कालीन परम पतितावस्था को प्रदर्शित करते हैं।

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अपराह्न को ‘सेठ जी’ के यहाँ चाय – पान था, जिसके बाद श्री हरिश्चन्द्र जी के यहाँ भी मित्र-मण्डली तथा साहित्य-मण्डली जुटी। यशपाल जी ने सुन्दर निबन्ध पढा, मैंने भी कुछ कहा, प्रो. प्रकाशचन्द्र गुप्त और दूसरे भी बोले ।
27 मई को सवेरे पहली ही बस से हम दोनों अल्मोड़ा से चल पड़े।

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