TMC के 20 बागी सांसदों के विलय से चर्चा में आई NCPI: जानिए 822 वोट पाने वाली पार्टी का इतिहास और क्या है आगे का प्लान

कल तक जिस राजनीतिक दल का नाम किसी ने नहीं सुना था, वह नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) अचानक से राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र…

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कल तक जिस राजनीतिक दल का नाम किसी ने नहीं सुना था, वह नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) अचानक से राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गई है। रविवार को पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी लोकसभा सांसदों ने इसी NCPI में विलय का ऐलान कर दिया। इसके बाद बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर संसद में अलग बैठने की जगह मांगी और एनडीए (NDA) को समर्थन देने की घोषणा की।

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इस बड़े सियासी उलटफेर के बाद हर कोई यह जानने को उत्सुक है कि आखिर NCPI है क्या और कैसे महज 822 वोट पाने वाली पार्टी के पास रातों-रात 20 सांसद आ गए।
क्या है NCPI का इतिहास और रिकॉर्ड?
चुनाव आयोग के दस्तावेजों के मुताबिक, NCPI को 20 जनवरी 2023 को एक गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल (RUPP) के रूप में पंजीकरण मिला था। इस पार्टी की कोषाध्यक्ष श्वेली कुंडू हैं, जो बिस्वाबाजार प्राइवेट लिमिटेड जैसी अन्य संस्थाओं की निदेशक भी हैं। पार्टी के अध्यक्ष श्वेली के पति उत्तिया कुंडू हैं। खास बात यह है कि इस पार्टी का पंजीकृत पता पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के बनिपुर इलाके का है। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार, पार्टी को कुल मिलाकर मात्र 1.13 लाख रुपये का चंदा मिला था।


बंगाल में रजिस्ट्रेशन, लेकिन त्रिपुरा में लड़ा पहला चुनाव
भले ही पार्टी बंगाल में पंजीकृत थी, लेकिन उसने अपना पहला चुनावी दांव 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में खेला। NCPI नेता शांतनु डे के अनुसार, पार्टी ने त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (TTAADC) क्षेत्र के वंचित आदिवासियों का प्रतिनिधित्व करने के लिए वहां चुनाव लड़ने का फैसला किया था। पार्टी ने सात सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन चार के नामांकन खारिज हो गए। केवल दो सीटों पर पार्टी अपने चुनाव चिह्न पर लड़ी और एक सीट पर निर्दलीय को समर्थन दिया।


मिले सिर्फ 822 वोट?
त्रिपुरा चुनाव में NCPI को करारी हार का सामना करना पड़ा। पार्टी को चावमानू सीट पर 536 और कैलाशहर सीट पर 286 वोट मिले। कुल मिलाकर NCPI केवल 822 वोट ही हासिल कर सकी। इस हार और पैसों की कमी के कारण पार्टी पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव और 2026 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों से भी पीछे हट गई।


बागी सांसदों ने विलय के लिए क्यों चुनी यह छोटी पार्टी?
सियासी जानकारों के मुताबिक, TMC के बागी सांसद सीधे तौर पर अलग गुट नहीं बना सकते थे, क्योंकि ऐसा करने पर उन पर दल-बदल कानून (Anti-defection law) लागू हो जाता और उनकी सांसदी जा सकती थी। इससे बचने के लिए उन्होंने पहले से पंजीकृत पार्टी (NCPI) में विलय का सुरक्षित रास्ता चुना।


बागी गुट के प्रमुख नेता सुदीप बंद्योपाध्याय (जो कभी ममता बनर्जी के बेहद करीबी माने जाते थे) ने कहा है कि NCPI में विलय केवल उनका पहला कदम है। आने वाले जुलाई महीने में यह बागी गुट चुनाव आयोग और अदालत में असली TMC और उसके चुनाव चिह्न पर अपना दावा पेश करेगा।

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