प्रतिवर्ष 5 दिसंबर को विश्व मृदा दिवस मनाया जाता है। मृदा एक जीवित एवं बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधन है। स्वस्थ मृदा में 45% खनिज, 25% जल, 25% वायु तथा 5% कार्बनिक पदार्थ पाया जाता हैं। इस वर्ष की विश्व मृदा दिवस की थीम “मिट्टी को जीवित रखें, मिट्टी की जैव विविधता की रक्षा करें” का मुख्य उद्देश्य किसानों तथा आम नागरिकों को मृदा के महत्व के बारे में जागरूक करना है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) नई दिल्ली के अनुसार भारत में 8 प्रकार की मिट्टियां पाई जाती हैं, जिसमें सर्वाधिक जलोढ़ मिट्टी (43%) पाई जाती है। मृदा में अनेक प्रकार के सूक्ष्म जीवजंतु पाए जाते हैं। 1 कप (128 ग्राम) मृदा में लगभग 200 बिलियन बैक्टीरिया, 20 मिलीयन प्रोटोजोआ, 1 लाख निमेटोड तथा 50 हजार आर्थोपोडा पाए जाते हैं।


पौधों की अच्छी वृद्धि एवं विकास हेतु 17 पोषक तत्वों की आवश्यकता होती हैं। यह पोषक तत्व हवा, पानी तथा मिट्टी से पौधों को प्राप्त होता है। नाइट्रोजन (N), फास्फोरस (P), पोटेशियम (K), कैल्शियम (Ca), सल्फर (S), मैग्नीशियम (Mg), कार्बन (C), ऑक्सीजन (O) तथा हाइड्रोजन (H) मैक्रोन्यूट्रिएंट के अंतर्गत आते हैं। लोहा (Fe), बोरान (B), क्लोरीन (Cl), मैग्नीज (Mn), जस्ता (Zn), तांबा (Cu), मॉलीब्लेडिनम (Mo) तथा निकिल (Ni) माइक्रोन्यूट्रिएंट के अंतर्गत आते हैं। पौधों में उचित विकास हेतु मृदा का पीएच 5.5 से 7 तथा नाइट्रोजन फास्फोरस और पोटाश का अनुपात 4:2:1 होना चाहिए। पौधे इन तत्वों को आयन के रूप में प्रयोग करते हैं। पौधों की वृद्धि एवं विकास के लिए पोषक तत्व न केवल पर्याप्त मात्रा में बल्कि उचित अनुपात में भी उपलब्ध होना चाहिए। हमारे भोजन का 95% भाग मिट्टी से आता है। वर्तमान में विश्व की संपूर्ण मिट्टी का 33% भूभाग बंजर अथवा खराब हो चुकी है। खेती की मिट्टी के लिए जरूरी पोषक तत्वों की कमी के कारण मिट्टी की सेहत लगातार गिरती जा रही है। खराब होती मिट्टी को देखते हुए केंद्र सरकार ने वर्ष 2015 से मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना प्रारंभ किया है, जिसके तहत किसानों को पोषक तत्वों की तय मात्रा का इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है।


केंद्रीय मृदा जल संरक्षण अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान (CSWCRT) देहरादून द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार भारत में मृदा के कटाव के कारण हर साल 5334 मिलियन टन मिट्टी की हानि होती हैं, जो कि औसतन 15 टन प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी की हानि हो रही है। एक अध्ययन के अनुसार 1 किलोमीटर सड़क के निर्माण से लगभग 40 से 80 हजार क्यूबिक मीटर मलवा बनता है, जिससे मृदा में उपस्थित उपयोगी पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। देश में मृदा अपरदन को रोकने के लिए सन 1953 में केंद्रीय मृदा संरक्षण बोर्ड का गठन किया गया है।


मृदा के संरक्षण हेतु वनीकरण सबसे अच्छा तरीका है, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई को रोका जाना चाहिए, जानवरों द्वारा वनों व घास की भूमि के ओवरग्रेजिंग को नियंत्रित करना चाहिए, चारा फसलों को बड़ी मात्रा में उगाना चाहिए। मृदा की उर्वरता बनाए रखने के लिए क्रॉप रोटेशन, मिश्रित खेती को बढ़ावा देना चाहिए। कंटूर जुताई प्रणाली, सीढ़ीदार खेती प्रणाली अपनानी चाहिए। किसानों को अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों के प्रयोग से बचना चाहिए। जैविक तथा हरी खाद का प्रयोग कृषि एवं बागवानी हेतु करना चाहिए। मृदा की कमी को देखते हुए वर्तमान में हाइड्रोपोनिक्स विधि द्वारा बागवानी की जा रही है। बिना मिट्टी के केवल पानी में जरूरी पोषक तत्व उपलब्ध करा कर नियंत्रित जलवायु (15 से 30 डिग्री सेल्सियस तथा 80 से 85% आद्रता) में पौधे उगाने व बागवानी करने की विधि को हाइड्रोपोनिक्स कहा जाता है, जोकि भविष्य की कृषि हेतु वरदान साबित हो रही है।

:- डॉ. भरत गिरी गुसाई (टिहरी गढ़वाल)