Diwalikhal lathicharge

अल्मोड़ा, 03 मार्च 2021
उत्तराखंड के दिवालीखाल में आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज (Diwalikhal lathicharge)
हुआ है। गैरसैंण में ग्रीष्मकालीन राजधानी स्थापना के बाद यह पहला मौका है जब पहाड़ की आत्मा पहाड़ में चलने वाला सत्र सुरक्षा की दृष्टि से इतना महत्वपूर्ण हो गया कि वहां आने वाली जनता की हड्डियां बजाने का इंतजाम करना पड़ा।

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यह तो सरकार हुई बल जो लोगों को नियंत्रित करने के लिए खाकी रंग का चाबुक हमेशा अपने पास रखती है और प्रजा को यह गलतफहमी हो जाती है कि वह लोकतंत्र में रहते हैं यहां जनता की सरकार जनता के लिए है। जो जनता के भले के लिए बड़े—बड़े कदम उठाती है।

अब 27 बरस पीछे की बात ले लो तब मुजफ्फर नगर भी तो अपना ही था। लखनऊ की सरकार भी अपनी ही थी। अपने ही लोग अपनी सरकार के पास मिलने राजधानी जा रहे थे। मुजफ्फरनगर में किस तरह खाकी चाबुक ने उनके उम्मीदों को वास्तविक अहसास दिलाने का काम किया कि सरकार तो सरकार होती है।

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अब आंदोलनकारी प्रशासन पर निरंकुशता का आरोप लगा रहे हैं। अरे साहब लाठी चार्ज (Diwalikhal lathicharge) ही तो हुआ है महिला सशक्तिकरण के नारे के बीच महिलाओं पर लाठी ही तो भांजी गई है।

गोली तो नहीं मारी ना, यहां प्रशासन की मित्रता सेवा और सुरक्षा के नारे की तारीफ होनी चाहिए कि नहीं होनी चाहिए। क्योंकि 27 साल पहले मुजफ्फरनगर भी अपना ही था और सरकार भी अपनी ही थी तब भी जो आंदोलनकारी सरकार से मिलने की उम्मीद में तत्कालीन राजधानी को रवाना हुए थे उनपर भी तो कार्रवाई हुई थी।

मुजफ्फरनगर (Diwalikhal lathicharge) ही नहीं खटीमा, मंसूरी सहित कई ऐसे मामले उत्तराखंड के साथ जुड़े हैं जब लोकतंत्र की पूजा करने वालों को लोकतांत्रित विरोध से पूर्व इस तरह खाकी चाबुक से नियंत्रित करने की कोशिश की गई। जनता की बिसात ही क्या है वह पैदा ही अभावों में रहने व खपने की होती है। साहेब की ड्यूटी साहेब की सुरक्षा के लिए नहीं तो और किसके लिए होगी। यह हमें समझना चाहिए।

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पहाड़ी राज्य के पहाड़ी क्षेत्र में ग्रीष्मकालीन राजधानी में हो रहे विधानसभा सत्र में जब पहाड़ के ग्रामीण विधानसभा तक अपनी समस्या पहुंचाने जा रहे हों तब उन्हें रास्ते में रोक हड्डियां बजाने का फैसला किसने सुनाया होगा।

यही नहीं अब लाठियां (Diwalikhal lathicharge) बरसाने वाले हाकिम इस घटना को जानबूझ कर तूल देने और गलत खबर चलाने की बात भी कह रहे हैं। कहा जा रहा है कि पुलिस पर पहले पत्थर बरसाए गए। यानि पहाड़ की जनता को पत्थरबाज बताने का काम भी शुरू हो गया है।

साहब को भी पता है जब मुजफ्फरनगर (Diwalikhal lathicharge) के खलनायकों पर हमेशा कृपा रही तो उनका बाल बांका कौन कर सकता है। समय आने पर सर्वोच्च कुर्सी उनका भी इंतजार कर रही है। खुद को लोकतंत्र में विशिष्ट समझने वालों को अब समझ जाना है कि साहब को डिस्टर्ब नहीं करना है।

आंदोलन 88 दिन का हो या और पुराना बस किस्मत को कोसना है। वरना अपने घर के दरवाजे कौन मुखिया बच्चों के लिए इस तरह बंद कर सिसौणपाणि (पानी की बौझार लाठियां समझ लें) की व्यवस्था करता है।

लेकिन एक बात साफ हो गई है 27 साल बाद इतिहास ने खुद को दोहरा दिया है। तब मुजफ्फरनगर (Diwalikhal lathicharge) की घटना के दिन भी लोकतांत्रिक सरकार के हाकिमों ने रौंदा था आज भी अपनी ही लोकतात्रिक सरकार के हाकिमों ने कूटा है।

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