उत्तराखंड विधानसभा से कर्मचारियों की बर्खास्त मामले की CBI जांच कर नौकरी देने वाले नेताओं और अधिकारियों पर भी हो कार्यवाही- बिट्टू कर्नाटक

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अल्मोड़ा। आज प्रैस को जारी एक बयान में पूर्व दर्जा मंत्री (कैबिनेट स्तर) एवं उत्तराखण्ड कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष बिट्टू कर्नाटक ने कहा कि विधानसभा में कार्यरत चुनिंदा कर्मचारियों को जिनकी नियुक्ति 2016 के बाद हुई थी को विधानसभा से निकाला जाना जहां सरकार की अपने चहेतों को बचाने की साजिश है वहीं दूसरी ओर ये भारतीय संविधान में निहित समानता के अधिकार अनुच्छेद 16 का भी उल्लंघन है।उन्होंने कहा कि समानता का अधिकार अनुच्छेद 16 स्पष्ट करता है कि राज्य के अधीन किसी भी कार्यालय में रोजगार या नियुक्ति से सम्बन्धित मामलों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समानता होगी।ऐसे में 2001 से 2016 तक की नियुक्तियों को वैध और 2016 से आगे की नियुक्तियों को अवैध ठहराकर सरकार ने समानता के अधिकार अधिनियम की धज्जियां उडा़ दी हैं।उन्होंने कहा कि यदि विधानसभा में हुई नियुक्तियां गलत तरीके से की गयी हैं तो 2001 से की गयी सभी नियुक्तियों को तत्काल निरस्त किया जाए। लेकिन सरकार ऐसा नहीं करेगी क्योंकि 2016 से पहले विधानसभा में हुई नियुक्तियों में भाजपा के मंत्रियों के नजदीकियों को बंदरबांट की गयी हैं।

उन्होंने कहा कि आज सरकार की इस निरंकुश नीति से विधानसभा से बर्खास्त एक सौ पचास परिवारों के सामने भूखे मरने की नौबत आ गयी है और वे परिवार धरने पर बैठे हैं।उन्होंने कहा कि विधानसभा में 2016 के बाद वाले कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर वाहवाही लूटने वाली स्पीकर ऋतु खंडूड़ी यदि सही होती तो एक समान न्याय कर राज्य बनने से अभी तक विधानसभा में गलत तरीके से की गयी सभी नियुक्तियों को निरस्त करती।लेकिन व्यक्तिगत रूचि लेते हुए वे विधानसभा में 2016 से पहले के बैकडोर भर्ती वालों को बचाने का कार्य कर रही हैं।2016 से पहले की नियुक्तियों में कार्यवाही न होना सीधे तौर पर भाजपा की भाई भतीजावाद की राजनीति को सिद्ध करता है। उन्होंने आगे कहा कि एक ओर वर्तमान स्पीकर हाईकोर्ट में खुद मान चुकी हैं की वर्ष 2001 से लेकर 2022 तक की सभी भर्ती अवैध हैं।उनके द्वारा हाईकोर्ट में काउंटर फाइल कर खुद जीता जागता उदाहरण प्रस्तुत किया है। इसके बाद भी 2016 से पहले नियुक्त पाने वालों को वे बचाने का भरसक प्रयास कर रही हैं।जो उनके दोहरे आचरण को सिद्ध करता है। वर्ष 2016 से पहले विधानसभा में अवैध रूप से भर्ती हुए कई कर्मचारी ऐसे हैं,जिनकी विधानसभा में नियुक्ति उनके पिता बीसी खंडूड़ी के मुख्यमंत्री रहते हुए हुईं।इसमें तत्कालीन सीएम बीसी खंडूड़ी के पर्यटन सलाहकार की बेटी सहित कई हाई प्रोफाइल लोगों के परिजन शामिल हैं।

कर्नाटक ने कहा कि इन्हीं लोगों को बचाने के लिए स्पीकर ने भेदभाव भरी कार्यवाही करने से भी परहेज नहीं किया। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस कार्यवाही को स्पीकर सत्य की जीत करार दे रहीं हैं, दरअसल वो एक अधूरा और झूठा सत्य है।खुद स्पीकर की बनाई डीके कोटिया समिति ने भी अपनी रिपोर्ट के प्वाइंट नंबर 12 में साफ किया है कि राज्य गठन के बाद से लेकर अभी तक की सभी भर्तियां अवैध हैं।इसी के साथ विधानसभा के हाईकोर्ट में दाखिल काउंटर के प्वाइंट नंबर 14 में भी विधानसभा ने सभी भर्तियों को अवैध करार दिया है।इसके बाद भी स्पीकर का विधिक राय के नाम पर 2016 से पहले की नियुक्ति वालों को बचाना असंवैधानिक है।उन्होंने कहा कि कार्यवाही सभी के खिलाफ एक समान रूप से होनी चाहिए।सत्ता पक्ष के लोगों को बचाने के लिए दोहरे नियम लागू हो रहे हैं।एक ही प्रक्रिया से भर्ती हुए सभी अवैध भर्ती वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए।उन्होंने कहा कि जीरो टालरेंस का दावा करने वाली भाजपा सरकार की पोल जनता के समक्ष खुल चुकी है।उन्होंने मुख्यमंत्री से मांग की है कि यदि कार्यवाही की जानी है तो 2001 से 2022 तक की सभी अवैध नियुक्तियों को निरस्त किया जाए अन्यथा द्वेषपूर्ण राजनीति के तहत निकाले गये 2016 के बाद के कार्मिकों की भी नियुक्ति बहाल की जाए।

कर्नाटक ने कहा कि सरकार का मानना है कि विधानसभा में नौकरी अवैध तरीके से पायी गयी थी इसलिए दण्ड स्वरूप उन्हें बर्खास्त कर दिया गया है तो उन कार्मिकों से ज्यादा अपराधी उनको सेवा पर रखने वाले माननीय और जिन अधिकारियों के हस्ताक्षर से इन कार्मिकों को नौकरी दी गयी वे अधिकारी हैं।उन्होंने कहा कि आज एक सौ पचास विधानसभा से बर्खास्त कर्मचारियों के परिवार मानसिक एवं आर्थिक संकट में हैं।यह एक बेहद गंभीर मामला है।यदि सरकार को उक्त नियुक्तियां गलत लगती हैं तो इस मामले की सीबीआई जांच कराई जाए ताकि इन कर्मचारियों को नौकरी देने वाले हाई प्रोफाइल माननीय और बड़े अधिकारियों पर भी कड़ी कार्यवाही हो जो कि एक मिसाल बने।

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