sahitaykaro ki nazaro me Almora

टैगोर भवन-
Almora
1913 में नोबल पुरस्कार से सम्मानित विश्वविख्यात कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर (7 मई, 1861 -7 अगस्त , 1941) अपने शिष्य, प्रसिद्ध कृषि-वैज्ञानिक ‘विवेकानन्द कृषि अनुसंधानशाला’ के संस्थापक और तत्कालीन निदेशक , बोशी (बंशीश्वर) सेन के आमंत्रण पर 1937 में अपने पुत्र रथीन्द्रनाथ व पुत्रवधू प्रतिमा के साथ अल्मोड़ा पहुँचे थे।

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शुरू में कुछ दिन बोसी सेन के निवास ‘कुन्दन हाउस’ में रहने के बाद उन्होंने छावनी – क्षेत्र में स्थित ब्रिटिशकालीन एक सुन्दर बंगले ‘सेंट मार्क्स हाउस’ में निवास किया था।


उनके वहाँ रहने की व्यवस्था बोसी सेन ने ही करवाई थी। इससे पूर्व 1903 में भी रवीन्द्रनाथ अपनी बारह वर्षीय बीमार पुत्री रेणुका के साथ रामगढ़ से होते हुए अल्मोड़ा आ कर कुछ दिन रह चुके थे।


रवीन्द्रनाथ मई-जून, 1937 में ‘सेंट मार्क्स’ नामक जिस बंगले में रहे थे ; 1961 में टैगोर शताब्दी के उपलक्ष में उसका नाम ‘टैगोर भवन’ रख दिया गया । वर्तमान में इसमें छावनी परिषद का कार्यालय है।


इस भवन में रहते हुए ही उन्होंने ‘सेजुति’,’नवजातक’,’आकाश -प्रदीप’ , ‘छेड़ार कवि’ की अनेक कविताओं व कई चित्रों की रचना की और एक विज्ञान-पुस्तक’विश्व परिचय’ का लेखन भी पूर्ण किया।

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‘टैगोर भवन’ में आज भी वह सोफा मौजूद है, जिसमें बैठ कर वे लिखते थे। 3 मई , 1937 को उनके सम्मान में Almora के नागरिकों ने रैमजे हाईस्कूल (वर्तमान रैमजे इण्टर कॉलेज) के प्रांगण में एक स्वागत-समारोह का आयोजन किया था, जिसमें वे शामिल हुए थे। उस समारोह की अध्यक्षता अल्मोड़ा के प्रसिद्ध लोक- कवि गौरीदत्त पाण्डे ‘गौर्दा’ ने की थी।

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उन्हीं दिनों वे मल्ला कसून स्थित, शान्तिनिकेतन में पढ़ रही अपनी शिष्याओं, सुश्री जयन्ती और गौरा पाण्डे (बाद में क्रमशः जयन्ती पन्त और गौरा पन्त ‘शिवानी’) के घर भी गए थे।


Almora में रहते हुए मैं कई बार’टैगोर भवन’ जा कर उसके आसपास चहलकदमी कर चुका हूँ। इस साल के प्रारम्भ में 13 जनवरी को एक बार फिर मैं अल्मोड़ा के युवा कवि-लेखक कुणाल तिवारी के साथ वहाँ पहुँचा।


कुछ देर वहाँ घूमने के बाद हमेशा की तरह मेरे मन में यही बात उमड़ती – घुमड़ती रही कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर-जैसे महान साहित्यकार की यादों से जुड़े इस स्थान को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करके बहुत दर्शनीय रूप दिया जा सकता था, लेकिन अब तक किसी भी सरकार ने इस ओर गम्भीरतापूर्वक ध्यान नहीं दिया और इसीलिए यह छावनी परिषद का कार्यालय-मात्र बन कर उपेक्षित ही रह गया है।

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लेखक परिचय— कपिलेश भोज

जन्म-तिथि:15 फरवरी, 1957
जन्म-स्थान:उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा जनपद का लखनाड़ी गाँव
शिक्षा:पहली से पाँचवीं तक कैंट प्राइमरी स्कूल, चौबटिया (रानीखेत) से। कक्षा 6 से 12 तक इण्टर कॉलेज, देवलीखेत (अल्मोड़ा) ; नेशनल इण्टर कॉलेज, रानीखेत, और राजकीय इण्टर कॉलेज, नैनीताल से।
बी.ए.और एम. ए.(हिन्दी साहित्य)कुमाऊँ विश्वविद्यालय नैनीताल के डी.एस. बी. कैम्पस से।
पीएच- डी.कुमाऊँ विवि नैनीताल से।
सम्पादन:1980 के दशक में कुछ समय तक गाजियाबाद (उ.प्र.) से प्रकाशित प्रसिद्ध हिन्दी मासिक पत्रिका ‘वर्तमान साहित्य’ का और 1990 के दशक में कुछ समय तक नैनीताल से प्रकाशित
त्रैमासिक पत्रिका ‘कारवाँ’ का सम्पादन किया ।
अध्यापन : 1988 से 2011 तक महात्मा गांधी स्मारक इण्टर कॉलेज , चनौदा (अल्मोड़ा) में प्रवक्ता (हिन्दी) के पद पर कार्य किया ।
प्रकाशित कृतियाँ :
यह जो वक्त है ( कविता-संग्रह )
ताकि वसन्त में खिल सकें फूल (कविता – संग्रह)
लोक का चितेरा: ब्रजेन्द्र लाल साह (जीवनी)
जननायक डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट (जीवनी)
सम्प्रति: अल्मोड़ा में रह कर स्वतंत्र लेखन।

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