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45 years of emergency – that night was strange

डेस्क: 25 जून 1975 की आधी रात! घड़ी में नई तारिख टंगने वाली थी,देश की जनता नई सुबह के सुहाने सपने को लेकर गहरी मीठी नींद के आगोश में थी। और एक नई सुबह का इंतजार कर रही थी। सुबह समय पर हुई लेकिन आंखे खुली तो मानव को मानव समझने वाले लोकतात्रिक ​अधिकार जेबी हो गए थे।सत्ता का गलियारा इसे अनुशासन का नाम देकर अपनी करनी को जायज ठहराने की कोशिश कर रहा था।

करीब पूरे दो साल तक सत्ता और सत्ता तक पहुंचाने वाली जनता के बीच आंदोलन चलता रहा।हालांकि इस सत्ता के इस कृत्य ने एक दल के कब्जे वाली सरकार को उखाड़ फैंक अपनी ताकत का अहसास करा भी दिया। आपातकाल (Emergency) लगते ही देश में विपक्ष के नेताओं की गिरफ्तारी शुरू हो गई। सुबह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी रेडियो पर आई और संदेश दिया कि राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है।


कहा जाय तो ठीक 45 साल पहले दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के संविधान में दिए गए नागरिकों के मूलभूत अधिकार छीन लिए गए थे, नेताओं के भाषण में हम अक्सर इस घटना का जिक्र करते हैं और कांग्रेस इसको लेकर रक्षात्मक मुद्रा अपनाती रही है।

आज हम राजनीति में जिन ज्यादातर बड़े चेहरों को देखते हैं वह आपातकाल (Emergency) के समय ही में आए थे। करीब 19 महीने तक देश में आपातकाल लागू रहा था और लेकिन इसके ठीक बाद हुए चुनाव में कांग्रेस की बुरी तरह से हार हुई थी और देश में पहली बार गैर कांग्रेस सरकार बनी थी।

1975 में कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 जून को आपातकाल (Emergency) की घोषणा की थी, उनके इस फैसले के बाद सरकार का विरोध करने वाले हर नेता, युवा को सलाखों के पीछे डाल दिया गया,मीडिया की आजादी पर सरकारी पहरा लागू हो गया और विपक्ष के सभी बड़े नेताओं को जेल भेज दिया गया.

आजाद भारत में आपातकाल (Emergency) को देश के लोकतंत्र में काले धब्बे की तरह की देखा जाता है। आपातकाल लागे होने से पहले सरकार यानी तत्कालीन इंदिरा सरकार ने कई पांसे खेले, कई प्रकार के दांव पेंच भी चले, 25 जून 1975 से 13 दिन पहले यानी 12 जून को इंदिरा गांधी को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रायबरेली में हुए चुनाव के दौरान की गई गड़बड़ी का दोषी पाया और छह साल के लिए पद से बेदखल कर दिया। जनता पार्टी के नेता राज नारायण ने 1971 में रायबरेली में चुनाव में हारने के बाद अदालत में शिकायत की थी। इस निर्णय के बाद भी सत्ता पक्ष गहरे सदमें में था। और वह हर हाल मे सत्ता पर काबिज रहना चाहता था।

आपातकाल (Emergency) के एक दिन पहले 24 जून 197 को इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और वहां भी इंदिरा गांधी को झटका लगा और फैसले को बरकरार रखा लेकिन साथ ही इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बने रहने की इजाजत दे दी गई।

25 जून को ही कांग्रेस के नेता रहे जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा के इस्तीफे की मांग को लेकर आंदोलन की शुरुआत की जिसे ‘संपूर्ण क्रांति’ कहा गया और देश में भर में प्रदर्शन शुरू हो गए थे। इसी दिन मध्य रात्रि को राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन आपातकाल (Emergency) की घोषणा कर दी।

संवैधानिक प्रावधानों के तहत प्रधानमंत्री की सलाह पर वह हर छह महीने बाद 1977 तक आपातकाल (Emergency) की अवधि बढ़ाते रहे, इस दौरान अनिवार्य पुरुष नसबंदी की गई लोगों को इससे बचने के लिए लंबे समय तक छिपने पर मजबूर होना पड़ा 18 जनवरी 1977 को इंदिरा गांधी ने लोकसभा को भंग कर दिया और मार्च में आम चुनाव की घोषणा की, सभी नेताओं को रिहा कर दिया गया। इसके बाद 21 मार्च 1977 को आपातकाल (Emergency) समाप्त हो गया।

बताया जाता है कि इस चुनाव की घोषणा भी आईबी की रिपोर्ट के बाद की गई जिसमे कहा गया था कि देश में इंदिरा के खिलाफ जनता में कोई आक्रोश नहीं है और वह 330 के करीब सीटें जीत रही हैं।

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