हल्द्वानी हिंसा: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, दो आरोपियों की जमानत रद्द, दो हफ्ते में सरेंडर करने के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने साल 2024 के चर्चित हल्द्वानी हिंसा मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत…

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सुप्रीम कोर्ट ने साल 2024 के चर्चित हल्द्वानी हिंसा मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत आरोपी जावेद सिद्दीकी और अरशद अयूब को दी गई ‘डिफ़ॉल्ट बेल’ को रद्द कर दिया है। उत्तराखंड सरकार की अपील को स्वीकार करते हुए जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने दोनों आरोपियों को दो सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया है।

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सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को बताया गलत

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि उत्तराखंड हाई कोर्ट का फैसला कानूनी और तथ्यात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण था। कोर्ट ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:

  • जांच अधिकारी पर टिप्पणी अनुचित: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट द्वारा जांच अधिकारी (IO) पर ‘लापरवाही’ या ‘सुस्त जांच’ के आरोप लगाना पूरी तरह से गलत था।
  • जांच की गति: कोर्ट ने रिकॉर्ड के आधार पर पाया कि गिरफ्तारी के शुरुआती 3 महीनों के भीतर ही 65 गवाहों के बयान दर्ज किए जा चुके थे, जो जांच की तेजी को दर्शाता है।
  • आरोपियों की देरी: बेंच ने नोट किया कि आरोपियों ने निचली अदालत द्वारा जांच का समय बढ़ाने के आदेश को समय पर चुनौती नहीं दी थी और चार्जशीट दाखिल होने तक का इंतजार किया।

क्या था पूरा मामला?

हल्द्वानी में हुई आगजनी, पथराव और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के मामले में इन आरोपियों को 9 फरवरी 2024 को गिरफ्तार किया गया था। उन पर आईपीसी की विभिन्न धाराओं सहित यूएपीए (UAPA) और आर्म्स एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज है।

जांच एजेंसी ने 90 दिन की समयसीमा समाप्त होने से पहले ही अदालत से समय बढ़ाने की मांग की थी। इसके बाद 7 जुलाई 2024 को चार्जशीट दाखिल कर दी गई थी। हालांकि, हाई कोर्ट ने जांच की गति को धीमा मानते हुए आरोपियों को जमानत दे दी थी, जिसे अब सर्वोच्च न्यायालय ने पलट दिया है।

कानूनी पैरवी

इस मामले में उत्तराखंड सरकार की ओर से विकाश नेगी, जतिंदर कुमार सेठी (D.A.G.) और आशुतोष कुमार शर्मा ने पैरवी की।

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