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दिल्ली बेस्ड पत्रकार दिलीप खान का फेसबुक (Facebook) के बारे में लिखा गया लेख काफी लम्बा है और इसे हम इसे किश्तों  में प्रकाशित कर रहे है पेश है पहला भाग

धूसर रंग की टीशर्ट और नीले रंग की जींस पैंट में उन्हें कई देशों में टहलते देखा जा सकता है। बेफ्रिक तरीके से और सुरक्षा के ताम-झाम के बिना। विश्वविद्यालयी छात्र से अरबों डालर राजस्व वाली कंपनी के सीईओ और अध्यक्ष वाले परिचय तक वह उम्र के एक ही दशक में पहुंच गए।

Facebook- हावर्ड विश्वविद्यालय में उन्होंने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी और अगले साल वहां वहां पर अतिथि अध्यापक के तौर पर क्लास लेने औaर वहां के विद्यार्थियों को नौकरी देने पहुंचे। उनकी बनाई वेबसाइट को इस समय दुनिया के 80 करोड़ से ज्यादा लोग 70 अलग-अलग भाषाओं में इस्तेमाल करते हैं। वो अमेरिका के हैं लेकिन दिल्ली के जामिया-मिलिया इस्लामिया में उनके उत्पाद पर पीएच.डी. हो रही है।

Facebook-इलाहाबाद के एक इंजीनियर को उन्होंने भारत में अब तक के सबसे ज्यादा वेतन पर नौकरी दी है। वे अड़यिल नहीं है। गलती करने पर माफी मांगने में ऐसा नहीं दिखाते कि उनकी इज्जत दांव पर लग गई हो। उनकी बनाई वेबसाइट में लोग उनके ही खिलाफ मोर्चा खोल सकते हैं और खोले भी हैं।

Facebook- अपनी प्रेमिका की दादी से बात करने के लिए वो मंडारिन भाषा तब सीखना शुरू करते हैं जब उनकी उम्र 26 साल की हो गई थी और जिस समय वह अपने जीवन के सर्वाधिक व्यस्त दिनचर्या में जी रहे थे। मांसाहार के शौकीन थे, लेकिन 2011 में उन्होंने घोषणा की कि वे शाकाहारी बन गए हैं। सामान्य लंबाई है। पांच फुट आठ इंच। हालांकि लोगों को वे ज्यादा लंबे दिखते हैं। अगर बातचीत से वो ऊब रहे होते हैं तो आजू-बाजू देखकर‘हां-हां’, ‘बिल्कुल-बिल्कुल’ बोलने लगते हैं।

Facebook- कंप्यूटर के साथ-साथ मनोविज्ञान और साहित्य में भी उनकी दिलचस्पी हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा उनके प्रशंसक हैं। वे एक ऐसे शख्स हैं जिनकी अब तक की जिंदगी उनके चेहरे की किताब के इर्द-गिर्द ही घूमती-चकराती रही है। चेहरे की किताब यानी फेसबुक!

आइए कहानी की शुरुआत करें। किस तारीख से शुरू करते हैं, यह ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है। हर तारीख आंखों में नहीं टंगती। घटनाएं तारीख में अर्थ भरतीं हैं तो तारीख घटनाओं को स्थाई बनाती है। आप एकदम से नहीं बता सकते कि सन 1981 में क्या हुआ, या फिर 82 और 84 में।

इन तारीखों का महत्व हर किसी के लिए अलग-अलग होगा। पूछने पर आप बताएंगे कि हुआ तो बहुत कुछ, लेकिन यह निर्भर इस बात पर करता है कि सामने वाला जानना क्या चाहता है। आप ये भी बता सकते हैं कि अरे हां, 1984 में तो मैंने पहली बार पूरे बाजू की कमीज पहनी थी, या फिर यह कि साईकिल से मैंने पूरे 12 किलोमीटर की सवारी की थी।

लेकिन, इस लेख के लिए जो 1984 का अर्थ है, हो सकता है वो आप में से कइयों पर लागू होता हो। बहुत संभव है कि मार्क जकरबर्ग की तरह आप भी 1984 के ही पैदाइश हों और इस समय आपकी उम्र भी उनकी ही तरह मात्र 28 साल की हो। समानता तो कई और भी हो सकते हैं। कोई बड़ी बात नहीं कि उनकी तरह आप भी शादी के ताजे अनुभव से गुजर रहे हों। दोनों नेटीजेन हों और आप दोनों को फेसबुक बेहद रास आता हो। लेकिन इन तमाम समानताओं के बावजूद एक फर्क है जो जकरबर्ग को जकरबर्ग बनाता है।

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बेहद सपाट लहजे में कहे तो इतना फर्क ही कम नहीं है कि आप जिस फेसबुक का इस्तेमाल करते हुए उनके साथ बराबरी की गुंजाइश तलाश रहे हैं, वो जकरबर्ग की उपज है। एक ऐसी उपज जिस पर खाता खोलने भर से आपके और जकरबर्ग के बीच समानता का एक और तार जुड़ जाता है। इस तरह Facebook जकरबर्ग को आपसे अलग भी करता है और आपके साथ भी ला पटकता है।

जन्म

यह 14 मई 1984 का दिन था। न्यूयॉर्क में मई का महीना भारत की तरह कोई चिपचिपा और उमस भरा नहीं होता। मई एक तरह से शानदार महीना होता है वहां। उस खुशगवार आदर्श मौसम में न्यूयॉर्क के डॉबी फेरी इलाके में दर्ज़नों बच्चों के बीच अस्पताल में करेन जकरबर्ग की कोख से जिस बच्चे ने जन्म लिया, उसका नाम मार्क रखा गया, मार्क इलियट जकरबर्ग। दूसरे-तीसरे साल से ही मार्क ने अपनी रुचि और रुझान को लेकर कुछ अलग संकेत देना शुरू कर दिया।

Facebook- धीरे-धीरे उसका अलहदापन पहले से ज्यादा साफ और ठोस होता चला गया। जब अपने स्कूल के दिनों में लोग शुरुआती पाठ सीखते हैं, जकरबर्ग कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर में सर खपाता था। घर लौटने के बाद घंटों कंप्यूटर पर बैठकर कुछ न कुछ करते रहना उसकी रोजमर्रा की आदत बन गई। कंप्यूटर उसकी सर्वाधिक पसंदीदा चीजों में से एक था।

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