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सिर्फ़ सर्दियों में नहीं, गर्मियों में भी वायु प्रदूषण एक बड़ी समस्या

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जहां आमतौर पर यह माना जाता है कि वायु प्रदूषण सर्दियों के दौरान होने वाली समस्या है, वहीं 10 शहरों के गर्मियों के दौरान जुटाये गए सरकारी डाटा पर नज़र डालें तो पता चलता है कि गर्मियों के महीनों में पीएम2.5 और पीएम10 के प्रति माह स्तर इन ज्यादातर महीनों में क्रमशः 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की सुरक्षित सीमाओं से अधिक रहे हैं।

फिलहाल प्रदूषण को लेकर जो भी नीतिगत निर्णय और कार्य किये जा रहे हैं, वे सभी सर्दियों के कुछ महीनों को ध्यान में रखकर ही हो रहे हैं। हालांकि सच्चाई यह है कि हम साल के ज्यादातर महीनों में वायु प्रदूषण के उच्च स्तरों की जद में होते हैं जिनका मानव स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। इसलिए यह ज़रूरी है कि वायु प्रदूषण से निपटान के लिए नीतीयां सिर्फ सर्दियों को नहीं बल्कि गर्मियों के महीनों को भी ध्यान में रख कर बनाई जाएँ।

इस परिस्थिति का विज्ञान समझाते हुए स्काईमेट वेदर में मौसम विज्ञान और जलवायु परिवर्तन विभाग में वाइस प्रेसिडेंट, महेश पलावत, का मानना है कि, “इस साल, मार्च और अप्रैल के दौरान प्री-मानसून बारिश लगभग शून्य थी और मार्च के दूसरे सप्ताह में ही हीटवेव की स्थिति भी शुरू हो गई थी। ऐसे लगातार शुष्क मौसम के दौरान, वायु प्रदूषण बढ़ जाता है क्योंकि बारिश प्रदूषकों को नहीं धोती है और धूल के कण जो पीएम 10 का गठन करते हैं, निचले वातावरण में बने रहते हैं। बलूचिस्तान, मध्य पाकिस्तान और थार रेगिस्तान से पश्चिमी हवाएं भी लंबे समय तक भारत-गंगा के मैदानों और मध्य भारत के कुछ हिस्सों और दक्षिण प्रायद्वीप यानी तेलंगाना, विदर्भ, मराठवाड़ा आदि में बहती रहीं। इसका मतलब है कि गर्मियों के महीनों में प्रदूषण खराब श्रेणी में रहा। आमतौर पर, जून के दूसरे पखवाड़े तक, देश के कई हिस्सों में प्री-मानसून बारिश होती है, जो हवा को साफ करती है, लेकिन इस साल ऐसा नहीं हुआ। इस साल, मध्य पूर्व में धूल भरी आंधी चली और हवाओं ने धूल को मुंबई, मध्य महाराष्ट्र और देश के मध्य भागों जैसे शहरों तक पहुँचाया। जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसी घटनाएं बढ़ती रहेंगी और इसलिए वायु प्रदूषण के स्तर को भी प्रभावित करती हैं।”

मौजूदा अध्ययन के लिए देश के 10 नॉन अटेनमेंट शहरों आगरा, बेंगलुरु, चंडीगढ़, चेन्नई, दिल्ली, कोलकाता, जोधपुर, मुंबई, लखनऊ, और पटना को चुना गया और इनमें मार्च, अप्रैल, मई तथा जून के महीनों के दौरान पीएम2.5, पीएम10 और एनओ2 के औसत स्तरों की निगरानी की गई। हालांकि भारतीय मौसम विभाग जून को मानसून का महीना मानता है मगर देश के विभिन्न हिस्सों में यह महीना ज्यादातर सूखा ही रहा। इसी वजह से इस महीने को भी इस विश्लेषण का हिस्सा बनाया गया है। सीपीसीबी ने पीएम 2.5, पीएम10 और एनओ2 के लिए जो सालाना औसत अनुमन्य सीमा तय की हैं, वे क्रमशः 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर, 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है।

वहीं, विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित सुरक्षित सीमाओं की बात करें तो यह क्रमशः 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर, 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है।

इस साल गर्मियों में कैसा रहा शहरों का हाल? 

डाटा के मुताबिक चेन्नई को छोड़कर बाकी सभी शहरों का पीएम 2.5 स्तर मार्च 2022 में अनुमन्य सीमा से अधिक रहा जबकि पीएम10 स्तर की बात करें तो यह सभी शहरों में सुरक्षित सीमा से ज्यादा ही रहा। अप्रैल में सिर्फ कोलकाता में इन स्तरों में सुधार हुआ और कोलकाता तथा चेन्नई ने ही पीएम2.5 की सुरक्षित सीमा को पार नहीं किया। सिर्फ चेन्नई ही ऐसा एकमात्र शहर रहा जहां अप्रैल माह के दौरान पीएम10 के स्तर सुरक्षित सीमाओं के अंदर ही रहे। मई के महीने में भी यही रुख बना रहा और सिर्फ चेन्नई, बेंगलुरु तथा कोलकाता में ही पीएम2.5 के स्तर सुरक्षित सीमाओं के अंदर रहे। वहीं, कोई भी शहर पीएम10 स्तरों के मामले में सुरक्षित मानकों को पूरा नहीं कर सकता। इस साल जून में देश के कुछ हिस्सों में बारिश हुई जिससे आगरा, बेंगलुरु, चेन्नई, कोलकाता और मुंबई शहरों में पीएम2.5 के स्तरों में सुधार हुआ और वह सीपीसीबी द्वारा निर्धारित सुरक्षित सीमाओं के अंदर रहे। जून के महीने में बेंगलुरु चेन्नई और मुंबई में पीएम10 के स्तर 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की सीमा के अंदर ही रहे।

2021 बनाम 2022 

इस साल पूरा देश मार्च के महीने से ही जबरदस्त तपिश की जद में रहा और इस दौरान हर जगह तापमान ने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए। मार्च का महीना पिछले 121 वर्षों के दौरान दर्ज किया गया सबसे गर्म मार्च रहा और इस दौरान पूरे देश का औसत अधिकतम तापमान 33.1 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया जो अब तक का सर्वाधिक है जो सामान्य से 1.86 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहा। बाद के महीनों में भी कमोबेश यही हाल बना रहा।

अत्यधिक गर्मी की वजह से बिजली का संकट भी पैदा हुआ, नतीजतन और ज्यादा मात्रा में कोयला जलाया गया जो कि प्रदूषण का एक प्राथमिक स्रोत है। हीटवेव के दौरान अत्यधिक तपिश और ठहरी हुई हवा के कारण न सिर्फ ओजोन प्रदूषण बढ़ा बल्कि पार्टिकुलेट प्रदूषण में भी वृद्धि हुई। स्थानीय स्तर पर लंबे समय तक सूखी गर्मी पड़ने के कारण हवा में तैरने वाले धूल के कणों की मात्रा में भी वृद्धि हुई। मानसूनपूर्व बारिश लगभग न के बराबर होने के कारण गर्मी की दुश्वारियां और भी ज्यादा बढ़ गईं। खास तौर पर उत्तर पश्चिमी मैदानी इलाकों में, जिन्हें वायु प्रदूषण के लिहाज से हॉटस्पॉट माना जाता है।

वर्ष 2021 से तुलना करें तो इस अध्ययन में लिए गए महीनों के दौरान ज्यादातर शहर जाहिर तौर पर पीएम2.5 और पीएम 10 के ऊंचे स्तरों से जूझते रहे। मिसाल के तौर पर सिर्फ मार्च के महीने में पीएम10 के स्तरों को छोड़ दें तो दिल्ली में पीएम2.5 और पीएम10 के स्तर 2021 के मुकाबले 2022 के इन 4 महीनों में अधिक रहे। यही हाल पटना का भी रहा। इन दोनों शहरों में पीएम 2.5 और पीएम10 के स्तर सीपीसीबी के मानकों से 5 गुने से ज्यादा ऊंचे रहे।

गर्मियों के दौरान प्रदूषणकारी तत्वों में हिस्सेदारी 

इस विश्लेषण के दायरे में लिए गए 10 शहरों में जहां पीएम2.5 के स्तर सुरक्षित सीमाओं से ज्यादा रहे, वहीं पीएम10 के स्तर भी उल्लेखनीय रूप से ऊंचे रहे और यह एक प्रमुख प्रदूषणकारी तत्व है। आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि 10 में से 8 शहरों में पीएम10 के स्तर इन 4 महीनों के दौरान कभी भी सुरक्षित सीमा के अंदर नहीं रहे। जून 2022 में बेंगलुरु का पीएम10 संकेंद्रण 58.49 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रिकॉर्ड किया गया और पहले से ही 200 मिलीमीटर वर्षा होने के बावजूद यह सुरक्षित स्तरों को विरले ही हासिल कर पाया। चेन्नई में भी पीएम10 का संकेंद्रण इस साल अप्रैल और जून के माह में ही सुरक्षित सीमाओं के अंदर रहा।

सर्वे के दायरे में लिए गए इन 10 शहरों में से पटना और दिल्ली में मार्च तथा अप्रैल के महीनों में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (एनओ2) के स्तर वार्षिक सुरक्षित सीमाओं को पार कर गए। वहीं, चंडीगढ़ में अप्रैल से जून तक यही हाल रहा, जबकि आगरा, चेन्नई, जोधपुर और कोलकाता जैसे अनेक शहरों में पिछले वर्ष के मुकाबले इस साल एनओ2 के स्तरों में वृद्धि देखी गई। एनओ2 एक गैस है जिसका अधिक संघनन होने से वायु मार्गों में इन्फ्लेमेशन हो सकता है।

दिन-ब-दिन लंबे वक्त तक संपर्क में रहना 

आंकड़ों से जाहिर होता है कि अनेक शहर लगातार अत्यधिक प्रदूषित दिनों के लगातार चलते सिलसिले की चपेट में हैं। अप्रैल 2022 में दिल्ली में कोई भी दिन ऐसा नहीं गुजरा जब पीएम 2.5 के स्तर सीपीसीबी द्वारा निर्धारित 24 घंटे की सुरक्षित सीमा यानी 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के अंदर रहे हों। इसी तरह मुंबई जैसे तटीय शहरों में सिर्फ नौ दिन ही ऐसे गुजरे जब पीएम 2.5 का संकेंद्रण स्तर सुरक्षित सीमाओं के अंदर रहा। आप यहां इन सभी शहरों का महीने दर महीने हीटमैप देख सकते हैं। इतने लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से मानव स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है।

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