देहरादून। दुनिया भर की नदियों से एक बेहद चिंताजनक और डराने वाली खबर आ रही है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि वैश्विक स्तर पर नदियों में ऑक्सीजन का स्तर लगातार कम होता जा रहा है, जिससे जलीय जीवों के अस्तित्व पर एक बड़ा खतरा मंडराने लगा है।
चीन के शोधकर्ताओं ने सैटेलाइटों और ग्राउंड सर्वे टीमों की मदद से साल 1985 से लेकर अब तक दुनिया भर की 21,000 से भी अधिक नदियों में ऑक्सीजन के स्तर का एक बड़ा अध्ययन किया है। इस रिसर्च में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि 1985 से अब तक नदियों में ऑक्सीजन का स्तर औसतन 2.1 प्रतिशत तक घट गया है और इसका बुरा असर लगातार बढ़ता ही जा रहा है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि ऑक्सीजन घटने की यही रफ्तार रही, तो इस सदी के अंत तक पूर्वी अमेरिका, भारत और उष्णकटिबंधीय (Tropical) क्षेत्रों की कई नदियों में ऑक्सीजन इतनी कम हो जाएगी कि मछलियों समेत कई जलीय जीव दम तोड़ने लगेंगे और इस सदी के खत्म होने तक दुनिया की नदियां औसतन चार प्रतिशत तक अतिरिक्त ऑक्सीजन खो देंगी।
रसायन विज्ञान और भौतिकी के मूल सिद्धांतों के हिसाब से गर्म पानी में ऑक्सीजन होल्ड करने की क्षमता कम होती है क्योंकि पानी गर्म होने पर ऑक्सीजन तेजी से निकलकर वातावरण में चली जाती है और इस पूरी प्रक्रिया को ‘डीऑक्सीजनेशन’ कहा जाता है। वैज्ञानिकों ने डर जताया है कि नदियों में ऑक्सीजन का स्तर गिरने से वहां ‘डेड जोन’ यानी जीवन विहीन क्षेत्र बनने लगेंगे, जैसा कि इस समय मेक्सिको की खाड़ी, चेसापीक खाड़ी और लेक एरी में साफ देखा जा रहा है।
अध्ययन में भारत को लेकर सबसे ज्यादा डराने वाली बात सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस सदी की शुरुआत में भारत की जीवनदायिनी गंगा नदी में ऑक्सीजन की कमी होने की रफ्तार वैश्विक औसत की तुलना में 20 गुना ज्यादा तेजी से दर्ज की जा रही थी। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगर दुनिया भर में कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में इसी तरह बढ़ोतरी जारी रही, तो इस सदी के अंत तक भारत, पूर्वी अमेरिका, आर्कटिक और दक्षिण अमेरिका की नदियां अपनी करीब 10 प्रतिशत ऑक्सीजन खो बैठेंगी।
इसके अलावा ब्राजील की अमेजन नदी और अन्य उष्णकटिबंधीय नदियों की हालत तो और भी ज्यादा खराब है, जहां 1980 के बाद से ‘डेड जोन’ यानी जीवन विहीन दिनों की संख्या हर दशक में 16 दिन बढ़ गई है। कुल मिलाकर दुनिया की नदियों में ऑक्सीजन का यह संकट हर दशक में 13 दिन की रफ्तार से बढ़ रहा है।
शोधकर्ताओं ने बताया कि अंधाधुंध बांधों का निर्माण, जल प्रवाह में छेड़छाड़, खेती में रसायनों-उर्वरकों का अंधाधुंध इस्तेमाल और शहरों से निकलने वाला गंदा कचरा इस संकट की सबसे बड़ी वजह हैं, जिससे हमारी नदियां लगातार बीमार हो रही हैं और धरती का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र गंभीर खतरे में आ गया है। उत्तराखंड की अन्य मुख्य खबरों के लाइव अपडेट्स के लिए यहाँ क्लिक करें।

