अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध समाप्त होने की उम्मीदें एक बार फिर धूमिल होती नजर आ रही हैं। 8 अप्रैल से लागू सीजफायर 22 अप्रैल को खत्म हो रहा है और इस बीच पाकिस्तान की मध्यस्थता में इस्लामाबाद में होने वाले दूसरे दौर की शांति वार्ता पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। ईरान ने फिलहाल अमेरिका के साथ अगली बातचीत में हिस्सा लेने से साफ इनकार कर दिया है।
बातचीत की कोई योजना नहीं दबाव और अल्टीमेटम नामंजूर
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बकई ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल अमेरिका के साथ अगले दौर की बातचीत की कोई योजना नहीं है। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस चेतावनी को भी सिरे से खारिज कर दिया जिसमें ट्रंप ने समझौता न होने पर ईरान के हर पावर प्लांट और पुल को नष्ट करने की धमकी दी थी। बकई ने कहा कि ईरान किसी भी तरह की डेडलाइन अल्टीमेटम और दबाव को नहीं मानता है और उसके फैसले राष्ट्रीय हितों के आधार पर होते हैं।
नाकेबंदी और यूरेनियम पर फंसा है मुख्य पेंच
शांति वार्ता में सबसे बड़ा रोड़ा अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी है। डोनाल्ड ट्रंप का दावा है कि नाकेबंदी से ईरान को हर दिन 500 मिलियन डॉलर का भारी नुकसान हो रहा है और जब तक समझौता नहीं होता यह नाकेबंदी जारी रहेगी। दूसरी ओर ईरान ने साफ कर दिया है कि जब तक बंदरगाहों से अमेरिकी नाकेबंदी नहीं हटाई जाती तब तक कोई बातचीत नहीं होगी। इसके अलावा ईरान ने अपने संवर्धित यूरेनियम के भंडार को अमेरिका को सौंपने की बात को भी पूरी तरह से खारिज कर दिया है।
पर्दे के पीछे पाकिस्तान की भूमिका और अविश्वास का माहौल
इस पूरे मामले में पाकिस्तान फिलहाल एकमात्र मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार लगातार ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची के संपर्क में हैं और क्षेत्र में शांति के लिए बातचीत पर जोर दे रहे हैं। इस्लामाबाद में संभावित बैठक के लिए सुरक्षा कड़ी कर दी गई है लेकिन अमेरिका का प्रतिनिधित्व करने वाले उप राष्ट्रपति जेडी वेंस अभी तक वाशिंगटन से रवाना नहीं हुए हैं।
अमेरिकी उकसावे से कूटनीतिक राह हुई मुश्किल
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची का कहना है कि अमेरिका की उकसावे वाली कार्रवाइयां बार बार संघर्षविराम का उल्लंघन और ईरानी व्यापारिक जहाजों के खिलाफ धमकियां कूटनीतिक प्रक्रिया में बड़ी बाधा डाल रही हैं। ईरान ने स्पष्ट किया है कि दोनों देशों के बीच गहरा अविश्वास है और आगे का कोई भी समझौता अमेरिकी आश्वासनों के बजाय ईरान की अपनी ताकत और गारंटी पर ही आधारित होगा।



