लेबनान में सिसकता बचपन और उजड़ते घर-यूएन की रिपोर्ट ने बयां किया 11 लाख विस्थापितों का दर्द

बारूद के धुएं और मिसाइलों के शोर के बीच लेबनान में इंसानियत सिसक रही है। संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट ने जो आंकड़े पेश किए…

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बारूद के धुएं और मिसाइलों के शोर के बीच लेबनान में इंसानियत सिसक रही है। संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट ने जो आंकड़े पेश किए हैं वे सिर्फ नंबर नहीं हैं बल्कि उन 11 लाख बेगुनाह लोगों की चीखें हैं जिन्हें अपना घर और अपनी पूरी जिंदगी छोड़कर दर दर भटकने को मजबूर होना पड़ा है।
 

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बमबारी के खौफ ने हंसते खेलते परिवारों को रातों रात शरणार्थी बना दिया है। इस पूरी तबाही में सबसे ज्यादा दर्दनाक स्थिति उन मासूम बच्चों और महिलाओं की है जिनका सियासत की इस जंग से कभी कोई लेना देना ही नहीं था।


मलबे में दबी मासूमों की साइकिलें और टूटते सपने
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट इस बात की गवाही देती है कि लेबनान में विस्थापित हुए लोगों में एक तिहाई संख्या सिर्फ छोटे बच्चों की है। बेरूत की सड़कों पर अब बच्चों की हंसी नहीं गूंजती बल्कि मलबे के ढेर में दबी उनकी टूटी हुई साइकिलें और खिलौने दिखाई देते हैं। आंकड़ों के अनुसार इस अंधी जंग ने अब तक 129 मासूम बच्चों सहित 1461 लोगों की सांसें छीन ली हैं। देश के 700 से ज्यादा राहत शिविरों में 1 लाख 37 हजार लोग खचाखच भरे हैं जिनमें 53 प्रतिशत केवल महिलाएं और बच्चियां हैं। ये वे लोग हैं जिनकी आंखों में अब भविष्य के सपने नहीं बल्कि कल की सुरक्षित सुबह देख पाने का खौफ है।


जान बचाने के लिए सीरिया की ओर कर रहे लोग पलायन
बमबारी का खौफ इतना गहरा है कि लोग अपना ही वतन छोड़ने को मजबूर हैं। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी के अनुसार सिर्फ मार्च के महीने में 2 लाख से ज्यादा लोगों ने जान बचाने के लिए लेबनान से सीरिया की तरफ पलायन किया है। इनमें 28 हजार से ज्यादा लेबनानी नागरिक हैं जो रातों रात अपने ही देश में बेगाने हो गए। मस्ना सीमा पर खड़ी बदहवास भीड़ सिर्फ इस उम्मीद में इंतजार कर रही है कि शायद दूसरी तरफ उन्हें आसमान से बरसती मौत से पनाह मिल जाए।


अस्पतालों पर गिरते बम और बीमारियों का साया
जंग के इस निर्मम दौर में जिंदगी बचाने वाले अस्पताल भी सुरक्षित नहीं बचे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक स्वास्थ्य सेवाओं पर 92 से ज्यादा हमले हुए हैं जिनमें 53 लोगों की जान गई है और 137 स्वास्थ्यकर्मी घायल हुए हैं। जो लोग बमों से बच गए हैं अब उन पर संक्रामक बीमारियों और गहरे मानसिक आघात का साया मंडरा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी है कि विस्थापन और शिविरों में भारी भीड़ के कारण खसरा और हेपेटाइटिस जैसी बीमारियां फैलने का खतरा बढ़ गया है। अपना सब कुछ आंखों के सामने खाक होते देख चुके हजारों लोग अब गहरे सदमे में हैं।


संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट पूरी दुनिया के लिए एक आईना है कि जब भी महाशक्तियां टकराती हैं तो सबसे बड़ी और सबसे दर्दनाक कीमत उस आम इंसान को चुकानी पड़ती है जिसका कोई कसूर नहीं होता। ये रिपोर्ट आप इस लिंक पर जाकर देख सकते है।

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