मुक्त बाजार को टिकाने के लिए कॉरपोरेट को चाहिए तानाशाही सरकार, देहरादून में बोले प्रो. रविभूषण

देहरादून। देहरादून के उत्तरांचल प्रेस क्लब सभागार में रविवार को इतिहास बोध विचार मंच की ओर से चतुर्थ प्रो. लाल बहादुर वर्मा स्मृति व्याख्यान का…

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देहरादून। देहरादून के उत्तरांचल प्रेस क्लब सभागार में रविवार को इतिहास बोध विचार मंच की ओर से चतुर्थ प्रो. लाल बहादुर वर्मा स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया गया। बीते रविवार यानि कल 17 मई को आयोजित ‘वर्तमान भारतीय परिदृश्य और हमारे कार्यभार’ विषय पर व्याख्यान देते हुए मुख्य वक्ता प्रो. रविभूषण ने कहा कि कॉरपोरेट की मुक्त बाजार व्यवस्था को खुद को टिकाने के लिए हमेशा एक कठोर सरकार और तानाशाही की दरकार होती है और आज देश में बिल्कुल यही माहौल दिख रहा है।

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उन्होंने कहा कि यह बाजारवादी व्यवस्था समाज की सामूहिकता को पूरी तरह खत्म कर देती है, इसलिए आज के दौर में स्त्री विमर्श, दलित विमर्श और आदिवासी विमर्श को अलग-अलग बंटने के बजाय एक साथ मिलकर चलना होगा।

प्रो. रविभूषण ने समाज में बदलाव के लिए सबसे पहले सच का साथ देने और आपसी संवाद को बढ़ाने पर जोर दिया। अपने संबोधन में उन्होंने मार्शल प्लान, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, बॉम्बे प्लान, अमेरिकी आर्थिक मॉडलों, शिकागो स्कूल और डंकल प्रस्ताव का हवाला देते हुए विस्तार से समझाया कि आज देश के जो हालात बने हैं, उसके बीज आजादी के 20-30 साल बाद ही बो दिए गए थे।

उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि 21वीं सदी जनता की नहीं बल्कि कॉरपोरेट की सदी है और यह आवारा पूंजी का युग है, जहां ‘न्यू इंडिया’ के नाम पर अमेरिकी वर्चस्व वाला डिजिटल इंडिया परोसा जा रहा है। उन्होंने मौजूदा सांप्रदायिक फासीवाद को नवउदारवादी व्यवस्था का ही प्रॉडक्ट बताया और कहा कि सांप्रदायिकता, मुक्त बाजार और राजनीति के बीच एक गहरा कनेक्शन है, जिससे अब लोकतंत्र के गर्भ से ही फासीवाद जन्म ले रहा है।

उन्होंने जनता को याद दिलाया कि 90 के दशक से पहले देश में कितने अरबपति थे और कितने किसान खुदकुशी करते थे, जबकि आज नोटबंदी, वोटबंदी और मुंहबंदी ने पूरे देश को एक भयानक संकट में धकेल दिया है, जिसे अब ‘चुनावी तानाशाही’ कहा जा रहा है। कॉरपोरेट के इशारे पर कल्याणकारी राज्य के दौर में बनी तमाम संवैधानिक संस्थाओं को एक-एक कर ढहाया जा रहा है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि व पत्रकार इब्बार रब्बी ने भी तीखा तंज कसते हुए कहा कि यह हमारी कैसी उपलब्धि है कि हमने अपने हिटलर और मुसोलिनी खुद देश में ही पैदा कर दिए हैं और हमें इन्हें विदेशों से इम्पोर्ट नहीं करना पड़ा।

कार्यक्रम की शुरुआत में प्रो. लाल बहादुर वर्मा की पुत्री आशु वर्मा ने उनके जीवन और कार्यों पर प्रकाश डाला। इस वैचारिक गोष्ठी का सफल संचालन दिगंबर और कैलाश नौडियाल ने संयुक्त रूप से किया। इस मौके पर डॉ. जितेंद्र भारती, राजेश सकलानी, नवीन कुमार नैथानी, दिनेश जोशी, उषा नौडियाल, संजीव घिल्डियाल, समदर्शी बड़थ्वाल, संजय जोशी, मदन मोहन चमोली और आरएन झा समेत क्षेत्र के दर्जनों साहित्यकार, संस्कृति कर्मी और सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे।

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