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उत्तराखण्ड के देहरादून में चौराहे पर इयरबड्स बेच रहा यह बुजुर्ग,महाराणा प्रताप से है यह कनैक्शन

Newsdesk Uttranews
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65 साल का है मोर सिंह, दिवाली तक कमाई करने आया दून

भले ही सड़कों पर ट्रैफिक दिल्ली जैसा हो, लेकिन दून में अब सुबह और शाम सर्द हो गयी हैं। चार-पांच दिन पहले ऐसी सर्द शाम को लगभग आठ बजे करीब मैं हरिद्वार बाईपास रोड के अजबपुर चौराहे पर पहुंचा तो एक बुजुर्ग जो कि बुरी तरह से कांप रहा था। उसके एक हाथ में लाठी थी और दूसरे हाथ में कान साफ करने की तीलियों का पैकेट बेचने की ललक में कार और दोपहिया सवारों के पास जा रहा था। कुछ ने खरीद लिए तो कुछ ने उसे दुत्कार दिया। मैं कार में था और ट्रैफिक अधिक था,इसलिए चाहते हुए भी उससे बात नहीं कर सका। लाइट ग्रीन होते ही मैं घर की ओर चल दिया। लेकिन मेरे मन में उस बुजुर्ग की तस्वीर अंकित हो गयी।

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टांगों में ताकत नहीं, पर भीख मांगना गंवारा नहीं

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चौराहों पर भीख मांगते बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग अक्सर नजर आते हैं, लेकिन यह बुजुर्ग भीख नहीं मांग रहा था बल्कि इयरबड्स बेच रहा था। इससे मैं प्रभावित हो गया। दूसरा कारण था उसके शरीर में हो रहा कंपन। मुझे लगा पार्किसन की बीमारी है। मैंने तय किया कि दूसरे दिन उस बुजुर्ग को पकडूंगा। दूसरे दिन चौराहे पर गया तो वह नजर नहीं आया। आधे घंटे तक इंतजार किया। तीसरे दिन भी यही हुआ। आसपास गुब्बारे बेचने वालों से पूछा तो पता लगा कि आज भी नहीं आया।


आखिरकार आज इंतजार खत्म हुआ। मैंने चौराहे से कुछ दूर पहले स्कूटी रोक दी। पैदल गया तो रोड के दूसरी ओर वहीं बुजुर्ग नजर आ गया। मैं लपक कर उसकी ओर बढ़ा। दस रुपये दिये तो उसने इयरबड्स़ का एक बंडल मेरी ओर बढ़ा दिया। मैंने कहा,कि बात करनी है। वह सड़क के एक किनारे आ गया। मैंने नाम पूछा तो बोला, मोर सिंह। राजस्थान के टोंक जिले का निवासी है। वह और उसकी पत्नी परमा दोनों दिवाली पर कुछ कमाई के लिए देहरादून आ गये। मोर सिंह के कुछ गांव वाले भी यहीं हैं। उनका एक ही बेटा है जो 15 साल का है और वह गांव में पढ़ भी रहा है और भेड़-बकरी भी चरा रहा है। मैंने कहा, गाड़िया लुहार हो, उसने सिर हिला दिया।


मैंने पूछा, यह पूरा शरीर हिल रहा है तो क्या डाक्टर को दिखाया? वह मासूमियत से बोला, नहीं। पैसे कहां हैं? टांगों में जान नहीं है। मैंने कहा, अब तो आयुष्मान कार्ड से इलाज फ्री है। जवाब, बना ही नहीं है। मैंने सोचा कि मोर सिंह भी आम गडरियों की तरह सड़क किनारे टेंट लगा कर रह रहा होगा, लेकिन ऐसा नहीं है। वह बताता है कि कारगी चौक के निकट एक कमरा लिया है। दो हजार रुपये महीना किराये पर। तीन लोग रह रहे हैं। एक गुब्बारे बेचने वाला भी साथ है।


मैंने पूछा, कितना कमा लेते हो रोजाना। 400-500, पत्नी भी ईयरबड्स ही बेचती है। वह कम कमाती है। मैंने पूछा, इतना तो भीख मांग कर भी कमा सकते हो। वह हंसा, बोला, भीख नहीं मांगनी। कुछ कमाना है और फिर वापस गांव लौट जाना है। वह गर्व से बताता है कि दो बीघा खेत भी हैं उसके पास।


सही बात है। मान-सम्मान से जीने का अधिकार हर व्यक्ति को है। यह व्यक्ति पर निर्भर है कि वह मेहनत की रोटी खाना चाहता है या बेईमानी की या भीख में मिली रोटी। गाड़िया लुहार जाति को किसी स्थान पर बसाने के हरसंभव प्रयास किये हैं लेकिन अधिकांश आज भी दर-दर भटकते हैं। गाड़िया लुहार मोर सिंह के स्वाभिमान को सलाम।

गाड़िया लोहार गाडुलिया लोहार या लोहार के नाम से भी जाने जाते है। यह भारत के उत्तर प्रदेश का एक खानाबदोश समुदाय हैं । गाड़िया लोहरा मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में भी पाए जाते हैं । वे पेशे से लोहार हैं जो बैलगाड़ी पर एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाते हैं, जिसे हिंदी में गाडी कहा जाता है , इसलिए इसका नाम ‘गाड़िया लोहार’ है। ये लोहार ईरान, पाकिस्तान और भारत के लोहार वंश से अलग हैं । वे आमतौर पर कृषि और घरेलू उपकरण को बनाते है और उनकी मरम्मत करते हैं।


उनके पूर्वज सेना में लोहार थे और लोहार मेवाड़ के महाराणा प्रताप के वंशज होने का दावा करते हैं। जब मेवाड़ मुगलों के अधीन हुआ तो महाराणा प्रताप जंगल की ओर गए और वहां उनकी मुलाकात गाड़िया लोहार लोगों से हुई और उन्होंने उनकी और परिवार की मदद की। कहते है कि उन्होंने प्रतिज्ञा की कि जब तक महाराणा प्रताप चित्तौड़गढ़ को वापस नहीं जीत लेते, तब तक वे कभी भी अपनी मातृभूमि में नहीं लौटेंगे, कभी कहीं और नहीं बसेंगे और कभी भी एक छत के नीचे नहीं रहेंगे। लेकिन महाराणा प्रताप चित्तौड़ को वापस नहीं जीत सके और इसलिए लोहारों की यह प्रतिज्ञा आज भी जारी है।

वरिष्ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुल वॉल से कुछ संशोधनों के साथ साभार