वनाग्नि प्रबंधन के लिए लोकप्रिय हो चुके शीतलाखेत मॉडल को राज्य में लागू करने की मुख्यमंत्री की घोषणा को 3 वर्ष बीत गए हैं, अभी भी यह मॉडल प्रभावी तौर पर लागू नहीं हो पाया है।
अब शीतलाखेत मॉडल के संयोजक गजेन्द्र कुमार पाठक ने मुख्य सचिव को ज्ञापन भेज सीएम की घोषणा के अनुरूप इस मॉडल को प्रभावी रूप से लागू करने की मांग की है।
ज्ञापन में उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री, उत्तराखण्ड पुष्कर सिंह धामी द्वारा वर्ष 2023 में वनाग्नि प्रबन्धन के शीतलाखेत मॉडल को सम्पूर्ण उत्तराखण्ड में लागू करने की घोषणा की गई थी, मगर आज तक इस मॉडल को प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया गया है। जिसके चलते वनाग्नि के कारण वन सम्पदा और पारिस्थितिकीय तंत्र को अपूर्णनीय हानि हो रही है, तथा मानव वन्यजीव संघर्ष लगातार बढ़ रहा है।
उन्होंने आगामी वर्ष 2027 के वनाग्नि काल में शीतलाखेत मॉडल के प्रभावी क्रियान्वयन की मांग करते हुए वनाग्नि काल की समय सीमा में संशोधन कर इसे 15 फरवरी से 15 जून के स्थान पर 1 जनवरी से आरम्भ कर वर्षाकाल के आरम्भ होने तक रखे जाने,वनाग्नि प्रबन्धन में जनसहयोग सुनिश्चित करने हेतु प्रत्येक ग्राम सभा में महिला मंगल दल का गठन किया जाये।
साथ ही ग्राम स्तरीय आपदा प्रबन्धन समिति में महिला मंगल दल की प्रभावी भूमिका रखी जाने, विस्तृत भागौलिक क्षेत्रफल में फैले वनों, सीमित मानवीय संसाधन के कारण वनाग्नि नियंत्रण में वन विभाग की सीमाओं के मद्देनजर प्रभावी वनाग्नि प्रबन्धन हेतु राजस्व विभाग, पुलिस विभाग, पंचायती राज विभाग, ग्राम्य विकास विभाग तथा वन विभाग के मध्य परस्पर सहयोग और तालमेल सुनिश्चित किये जाने की मांग की है।
ज्ञापन में कहा गया है कि चीड़/पीरूल वनाग्नि का मुख्य कारण नहीं है वरन शत प्रतिशत मामलों में मानवीय वाली वनाग्नि घटनाओं के कारणों की पहचान कर उनका समुचित समाधान किया जाये।
वनाग्नि आरम्भ होने के मुख्य कारण ओण/आड़ा/केड़ा/कूड़ा जलाने की परंपरा को समयबद्ध करने , वनाग्नि नियंत्रण में बेहद महत्वपूर्ण योगदान देने वाले फायर वार्चस को वनाग्नि प्रबन्धन, वनाग्नि नियंत्रण, फायर पट्टी निर्माण, मानव वन्यजीव संघर्ष न्यूनीकरण, जागरूकता अभियान, झाड़ी कटान से जोड़कर चार महीनों की जगह पूरे वर्ष भर वन संरक्षण, सवर्धन से जोड़कर वन विभाग को मानवीय संसाधन की दृष्टि से सुदृढ़ करने,
साथ ही वनाग्नि के कारण उत्पन्न समस्याओं, सूखते जलस्रोत, निरंतर बढ़ रहे मानव वन्य जीव संघर्ष, ग्लोबल वार्मिंग, क्लाईमेट चेन्ज के बारे में नई पीढ़ी को जागरूक करने हेतु राज्य के सभी शैक्षणिक संस्थानों में सितंबर माह से जागरूकता अभियान आरंभ करने व 1 अप्रैल को सम्पूर्ण राज्य में ओण दिवस का आयोजन वनाग्नि जागरूकता दिवस के रूप में करने की मांग की है।
ज्ञापन में यह भी मांग की गई है कि खनन न्यास की तरह लीस, छिलका, गुलिया आदि वनोपज से प्राप्त आय के निश्चित हिस्से का उपयोग वनाग्नि प्रबन्धन में करने व वनाग्नि से प्रतिवर्ष पौधारोपण कार्यक्रम को हो रहे व्यापक नुकसान को देखते हुए अगले दस वर्षों तक बृहद पौधारोपण कार्यक्रमों को स्थगित कर एएनआर पद्धति से नये जंगल विकसित करने और पौधारोपण के बजट का सदुपयोग वनाग्नि प्रबन्धन में करते हुए,ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू उपयोग के लिए चीड़ के युवा पेड़ों का कटान को रोकने के लिए ग्रामीणों को उचित विकल्प देकर चीड़ के पेड़ों की सुरक्षा की जाये।

