kabutari devi

7 जुलाई तीसरी पुण्यतिथि पर फिर याद आईं प्रसिद्ध लोक गायिका कबूतरी देवी (kabutari devi)

कुंडल सिंह चौहान

पिथौरागढ़। उत्तराखंड की प्रसिद्ध लोक गायिका कबूतरी देवी (kabutari devi) को उनकी तीसरी पुण्यतिथि पर मंगलवार को अनेक रचनाधर्मियों व लोक कलाकारों ने याद किया। कबूतरी देवी की दिल-दिमाग को गहरे छूने वाली गायकी और उसके पीछे छुपे दर्द को महसूस कर अनेक लोग आज भी भाव विह्वल हो जाते हैं।

लोक गायिका कबूतरी देवी (kabutari devi) का जन्म गांंव लेटी, काली कुमाऊँ, जिला चंपावत के प्रसिद्ध लोक गायक-वादक देवराम और लोक गायिका देवकी देवी के घर 18 जनवरी,1945 को हुआ था। गीत-संगीत के माहौल में पली बढ़ी कबूतरी की रुचि पारम्परिक लोकगीत गायन व संगीत के प्रति बचपन से ही हो गई थी। इसकी प्रारंभिक शिक्षा उन्हें पिता और माता से ही मिली। पहाड़ी गीतों में प्रयुक्त होने वाले रागों का निरंतर अभ्यास करने के कारण इनकी गायन शैली अन्य गायिकाओं से भिन्न रही

सन् 1959 में 14 वर्ष की आयु में कबूतरी देवी (kabutari devi) का विवाह क्वीतड़ गांंव, जिला पिथौरागढ़ के लोक गायक-वादक दीवानी राम के साथ हुआ। विवाह के बाद दीवानी राम (जिन्हें ये नेता जी के नाम से पुकारती थींं) ने इनकी प्रतिभा को पहचाना और लोक गायकी के क्षेत्र में पहचान बनाने के लिए निरंतर प्रोत्साहित करते रहे।

पति के प्रोत्साहन और प्रयासों से कबूतरी देवी (kabutari devi) सुदूर पहाड़ी गांव से आकाशवाणी व दूरदर्शन के स्टूडियो तक पहुंची। उन्होंने रेडियो के माध्यम से देश-प्रदेश में अपनी मधुर खनकती आवाज से गुंथे गीतों की धूम मचा दी। आल इंडिया रेडियो लखनऊ, रामपुर, नजीबाबाद, अल्मोड़ा और मुंबई केंद्रों से इनके गीतों का प्रसारण हुआ।

आकाशवाणी के लिए कबूतरी देवी (kabutari devi) ने लगभग 100 से ज्यादा गाने रिकार्ड कराये। इस बीच 30 दिसम्बर,1984 को उनके पति दीवानी राम का हृदयगति रुकने से निधन हो गया। तब कबूतरी देवी की उम्र मात्र 40 साल थी। पति की मृत्यु के बाद परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हो गया और ऐसे में एक बेटा भूपेन्द्र और दो बेटियाें मंजू व हेमन्ती के लालन-पालन के कारण लगभग 18-20 साल तक गीत-संगीत को छोड़ना पड़ा।

चिराग बुझ गया था, लेकिन आग बची थी। तब जनकवि गिरीश तिवाड़ी उर्फ गिर्दा ने उन्हें गुमनामी के अन्धेरे से निकाला। कबूतरी देवी के प्रसिद्ध गीतों में पहाड़ै ठंडो पाणी सुआ कैसी मीठी वाणी, आज पनि झौं-झौं भोले पनि झौं झौं, यो पापी कलेजी काटि खानि लागैं छी, ओ चड़ी धौपरी घामेंमा, बरस दिन को पैलाे म्हैना, मैंसौं दुःख क्वे जाणिव ना, ओ दुर्गा भवानी, जै जै जै देवी कनारा आदि शामिल हैं।

इसके साथ ही कबूतरी देवी ने मंगल गीत ऋतु रैणा, भगनौल, न्यौली, जागर, गनेली, झोड़ा चांचरी इत्यादि प्रमुख विधाओं में अपनी मधुर आवाज दी।

आखिरकार पहाड़ै ठंडो पाणी, सुआ कैसी मीठी वाणी, छोड़नि नि लागैनी…का संदेश देने वाली आवाज को भी सबकुछ छोड़कर जाना पड़ा। जिला अस्पताल पिथौरागढ़ में 7 जुलाई, 2018 को जन-जन के मन में बसी लोक गायिका कबूतरी देवी (kabutari devi) ने अंतिम सांस ली।

जिंदगी के आखिरी दिनों में वह अपनी छोटी बेटी श्रीमती हेमंती देवी के साथ रहीं और हेमन्ती ने मांं की इच्छानुसार ही उनकी चिता को मुखाग्नि दी। मंगलवार को उनकी तीसरी पुण्यतिथि पर जिला मुख्यालय में पर्वतीय कला केंद्र में हेमराज बिष्ट, भूपेंद्र बिष्ट, जनार्दन उप्रेती, खीम सिंह रावत व अन्य लोक कलाकारों व संस्कृति कर्मियों ने स्व. कबूतरी देवी के रचनाकर्म को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी।

कबूतरी देवी (kabutari devi) को मिले अनेक सम्मान

पिथौरागढ़। कबूतरी देवी को अनेक सरकारी और सामाजिक संस्थाओं ने सम्मानित किया। वर्ष 2002 में नवोदय पर्वतीय कला केंद्र पिथौरागढ़ ने पिथौरागढ़ छलिया महोत्सव में उन्हें सम्मानित किया।

इसके अलावा मोहन उप्रेती लोक संस्कृति कला एवं विज्ञान शोध समिति अल्मोड़ा में वर्ष 2013, पहाड़ संस्था ने सांस्कृतिक सम्मान वर्ष 2016, लाइफ अचीवमेंट सम्मान यंग उत्तराखंड सिने अवार्ड दिल्ली वर्ष 2014, उत्तराखंड लोक भाषा साहित्य मंच दिल्ली में महाकवि कन्हैयालाल डंडरियाल लोकगायन सम्मान, निसर्ग सृजन संस्थान लखनऊ की ओर से गिर्दा स्मृति सम्मान सन् 2015 उन्हें प्रदान किया गया। कबूतरी देवी को मरणोपरांत कुमाऊँ सांस्कृतिक कला मंच दिल्ली द्वारा 23वें उत्तरैणी कौतिक में उत्तरैणी सम्मान से सम्मानित किया गया जिसको हेमंती देवी ने ग्रहण किया।

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