अपूर्वा लोहुमी(लेखिका)
कुमाऊँनी भाषा ने उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान में लंबे समय से एक केंद्रीय स्थान बनाए रखा है।
यह केवल संवाद का माध्यम ही नहीं, बल्कि सामाजिक स्मृतियों, लोक ज्ञान और सांस्कृतिक निरंतरता की एक महत्वपूर्ण वाहक भी है।
हालाँकि, वर्तमान समय में यह भाषा एक गंभीर अस्तित्वगत संकट का सामना कर रही है। दैनिक जीवन में इसका उपयोग लगातार कम हो रहा है और युवा पीढ़ी के बीच इससे जुड़ाव या इसकी जानकारी भी तेज़ी से सीमित होती जा रही है।
भाषा किसी भी समुदाय की ज्ञान प्रणाली की नींव होती है। कुमाऊँनी भाषा में रची-बसी लोक कथाएँ, गीत, कहावतें और पारंपरिक अभिव्यक्तियाँ इस क्षेत्र के पारिस्थितिक और सामाजिक अनुभवों का एक समृद्ध संग्रह प्रस्तुत करती हैं। इसलिए, किसी भाषा का विलुप्त होना केवल शब्दों का खोना ही नहीं, बल्कि एक विशिष्ट ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विश्वदृष्टिकोण का विघटन भी है। कुमाऊँनी भाषा के इस पतन के लिए कई सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक कारक ज़िम्मेदार हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण कारक है,पलायन।
ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी केंद्रों की ओर लोगों के पलायन से उनके भाषाई व्यवहार में बदलाव आता है। शहरों में, हिंदी और अंग्रेज़ी जैसी प्रमुख भाषाएँ सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रतीक और आजीविका के साधन के रूप में कार्य करती हैं, जिसके परिणामस्वरूप कुमाऊँनी जैसी क्षेत्रीय भाषाएँ हाशिए पर चली जाती हैं।
शिक्षा प्रणाली इस असंतुलन को और भी गहरा कर देती है। औपचारिक स्कूली शिक्षा में क्षेत्रीय भाषाओं को शायद ही कभी कोई स्थान दिया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप बच्चे मुख्य रूप से हिंदी और अंग्रेज़ी में ही भाषाई दक्षता हासिल कर पाते हैं।
नतीजतन, कुमाऊँनी भाषा केवल घरेलू और अनौपचारिक परिवेश तक ही सीमित होकर रह जाती है और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक इसका हस्तांतरण धीरे-धीरे बाधित हो जाता है।
इसके अतिरिक्त बदलती सामाजिक आकांक्षाएँ भी इस समस्या को बढ़ाने में योगदान देती हैं। विशेष रूप से, अंग्रेज़ी भाषा को अक्सर आधुनिकता और प्रगति से जोड़कर देखा जाता है, जिसके चलते माता-पिता अपने बच्चों को इस भाषा का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इससे भाषाओं के बीच एक प्रकार का पदानुक्रम (hierarchy) निर्मित हो जाता है, जिसमें क्षेत्रीय भाषाओं को कम महत्व का समझा जाता है और परिणामस्वरूप वे धीरे-धीरे उपेक्षित होती चली जाती हैं।
इन चुनौतियों के बावजूद, कुमाऊँनी भाषा के पुनरुद्धार की संभावनाएँ अभी भी मौजूद हैं। इसके लिए कई स्तरों पर प्रयासों की आवश्यकता है।
सर्वप्रथम, कुमाऊँनी भाषा को प्राथमिक शिक्षा प्रणाली में शामिल किया जाना चाहिए, जिससे बच्चों में अपनी मातृभाषा के प्रति जुड़ाव और गर्व की भावना विकसित हो सके। दूसरे, जनसंचार माध्यमों और डिजिटल मंचों का उपयोग करके कुमाऊँनी भाषा को समकालीन संदर्भों में जीवंत बनाए रखने में मदद मिल सकती है। सोशल मीडिया पर कुमाऊँनी भाषा में सामग्री (content) तैयार करने और उसे साझा करने से यह भाषा युवा पीढ़ी के लिए अधिक प्रासंगिक और आकर्षक बन सकेगी।
(लेखिका एमिटी यूनिवर्सिटी, मोहाली (पंजाब) में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर कार्यरत है)

