Waiting days, a drawn-out movement became a record – SSB guerrillas have been sitting in agitation for 3900 days continuously

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गुरिल्ला वार्डोस की ट्रेनिंग के दौरान की एक फोटो- उपलब्धकर्ता शिवराज बनौला

अल्मोड़ा, 17 जुलाई 2020- अपनी मांगों को लेकर अक्टूबर 2009 में आंदोलन शुरु करने वाले गुरिल्लों(guerrillas) के आंदोलन को रिकार्ड बना दिया है.


इनके आंदोलन को 3900 दिन यानि 11साल पूरे होने को हैं. मुद्दे और मांगे अपनी जगह पहले की तरह ज्वलंत हैं. हां इस अवधि में कई युवा प्रौड़ हो गए हैं तो कई बुजुर्ग बेहतरीन कल की उम्मीद में दुनिया को छोड़ चुके हैं.

हाल में ही अल्मोड़ा जिलाधिकारी कार्यालय के प्रांगण मे एसएसबी स्वयं सेवक कल्याण समिति के guerrillas द्वारा नौकरी पैशन एवं अन्य सुविधाओ की मांग को लेकर दिए जा रहे धरने को 3900 दिन पुरे होने पर प्रधानमन्त्री भारत सरकार एवं मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड सरकार को ज्ञापन प्रेषित करते हुए मांग की गयी कि जब चीन अपनी विस्तारवादी नीति के चलते हमारी सीमा मे घुसपैठ कर रहा है पकिस्तान द्वारा सीमा पर लगातार गोली बारी व आतंकियों की घुसपैठ करायी जा रही है तथा नेपाल व बांग्लादेश जैसे हमारे पड़ोसी देश भारत के खिलाफ गतिविधियों मे संलग्न है तो इस स्थिति मे भारत सरकार द्वारा छापामार युद्ध मे प्रशिक्षित गुरिल्लों का उपयोग सीमावर्ती इलाकों मे बाहय व आंतरिक सुरक्षा मे किया जाना देशहित मे जरूरी हो गया है.

ज्ञापन में कहा गया है कि ऐसे ही विषम परिस्थितियों से निपटने के लिए सन् 1962 के भारत चीन युद्ध मे मिले सबक के बाद सीमावर्ती इलाको मे प्रशिक्षित किये गये थे कालान्तर मे सीमाओं पर युद्ध की स्थिति न बनने के कारण इन प्रशिक्षित गुरिल्लों का उपयोग नही हो पाया देश के सीमावर्ती राज्यों मे इस समय भी एक लाख प्रशिक्षित गुरिल्ले हैं जो स्थानिक भौगोलिक स्थितियों मे काम कर सकते है.


एसएसबी गुरिल्लों(guerrillas) द्वारा सेना का सहयोग,सेना के अनुपस्थिति मे दुश्मन से युद्ध करने दुश्मन को रोके रखने दुश्मन पर ख़ुफ़िया नजर रखने के साथ-साथ आंतरिक शांति व सुरक्षा व्यवस्था का कार्य किया जा सकता है.
इस दिन भी केन्द्रीय अध्यक्ष ब्रहमानंद डालाकोटी, जिलाध्यक्ष शिवराज बनौला, अर्जुन सिंह नैनवाल, खड़क सिंह पिलखवाल, गोपाल सिंह राणा, आनन्दी महरा आदि लोग धरने पर बैठे.

छापामार युद्ध में पारंगत हैं गुरिल्ले(guerrillas)

एसएसबी की ओर से जिन स्वयंसेवको को प्रशिक्षण दिया वह छापामार युद्ध में निपुण हैं इसीलिए इनका नाम गुरिल्ला युद्ध में निपुणता के चलते गुरिल्ला(guerrillas) पड़ा.सीमा क्षेत्रों में सूचनाओं का आदान प्रदान में भी यह टीम दक्ष थी.


अंतिम ट्रेनिंग 2003 में हुई.इसके बाद से यह पूरी प्रक्रिया बंद हो गई है.

अच्छे दिनों के इंतजार में 3 हजार से अधिक गुरिल्ले (guerrillas)गंवा चुके हैं जान

पूरे उत्तराखंड में 21हजार के करीब प्रशिक्षित गुरिल्ले हैं लेकिन एसएसबी में मानकों के अनुरूप समायोजन ,नियुक्ति व अन्य देयकों के इंतजार में जो लंबा समय बीत है उस अवधि के बीत में ही उत्तराखंड में करीब ढाई -तीन हजार गुरिल्लों (guerrillas)की मृत्यु हो चुकी है.

एसएसबी स्वयं सेवक कल्याण समिति के जिला अध्यक्ष शिवराज बनौला ने बताया कि 2 सौ से अधिक गुरिल्लों की मौत अल्मोड़ा में ही हो चुकी है.

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