corona ke kauf ke beech kheli gai patiya gaon ki bagwal

corona ke kauf ke beech kheli gai patiya gaon ki bagwal

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अल्मोड़ा। कोरोना वायरस महामारी के बीच ताकुला विकासखण्ड के पाटिया गांव में सदियों से चली आ रही बग्वाल (patiya gaon ki bagwal) की परंपरा इस बार भी निभाई गई।

corona ke kauf ke beech kheli gai patiya gaon ki bagwal


रविवार को गोवर्धन पूजा के दिन बग्वाल खेली गई। बग्वाल में पाटिया, भटगांव खाम पचघटिया गधेरे
के एक ओर कोटयूड़़ा,कसून गांव की टीम ने गधेरे की दूसरे छोर पर रहकर बग्वाल (patiya gaon ki bagwal) खेली।
लगभग आधे घंटे तक चली बग्वाल में कोटयूड़ा के गणेश बिष्ट ने सबसे पहले गधेरे में जाकर पानी पिया और इसके साथ ही बग्वाल (patiya gaon ki bagwal)
का समापन हो गया। इस दौराना बग्वाल को देखने के लिये लोगों का हूजुम उमड़ पड़ा।

पाटिया में बग्वाल संपन्न


बग्वाल (patiya gaon ki bagwal)
की शुरूवात से पहले गोधूलि बेला पर पाटिया गांव के अगेरा मैदान में गाय खेत में गाय की पूजा की गई। इस दौरान पिलख्वाल खाम के लोगो ने चीड़ की टहनी खेत मे गाड़कर बग्वाल की अनुमति मांगी। पाटिया के ग्राम प्रधान हेमंत कुमार आर्या इस मौके पर मौजूद रहे जबकि पाटिया गांव के ही पूरन चन्द्र पाण्डे ने विधिवत रूप से गाय की पूजा अर्चना कर विधिवत बग्वाल की रस्म अदा की।

कोटयूड़ा गांव के गणेश बिष्ट ने मैदान को पार कर पचघटिया (नदी) में जाकर पानी पिया और कोटयूड़ा की टीम इस बार के बग्वाल (patiya gaon ki bagwal) की विजेता बनी। पानी को छूने या पीने की रस्म के बाद यह बग्वाल युद्ध समाप्त हो गया इसके बाद लोगों ने एक दूसरे को बधाई देते हुए अगली बार मिलने का वादा कर विदा ली।

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पुराने समय में केवल ठाकुर (क्षत्रिय) लोग ही इस बग्वाल में भागीदारी करते थे लेकिन अब समय बीतने के साथ ही हर जाति का व्यक्ति और युवा इस पाषाण युद्ध में अपने पूरे जोश और खरोश के साथ भागीदारी करता है।

पत्थर युद्ध (patiya gaon ki bagwal) इस क्षेत्र में लंबे समय से खेला जाता है। यह पत्थर युद्ध कब से और क्यों खेला जा रहा है इस बारे में नयी और कुछ पुरानी पीढी को भी बहुत अधिक पता नहीं है लेकिन पुरखों की इस परम्परा को निभाने के लिए आज भी लोग पूरा समय देते हैं।

सम्बन्धित क्षेत्र के युवाओं में पिछले कई दिन से इस युद्ध के आयोजन के लिए तैयारी शुरू हो जाती है। मान्यता है कि वर्षो पूर्व किसी आतताई को भगाने के लिए देानो गावों के लोगों ने एकजुट होकर उसे पत्थरों से भगाया था और बाद में उसके भाग जाने और पानी पीने की मोहलत देने के अनुरोध पर ही गांव के लोगों ने उसे छोड़ा था।

हालाकिं नई पीढी इस कहानी के बारे में भी ज्यादा नहीं जानती है। पत्थर युद्ध नदी के दोनों छोरों से खेला जाता है और जिस टीम का व्यक्ति सबसे पहली पानी पीने पहुंच जाता है वही टीम विजयी घोषित हो जाती है। इसके साथ ही युद्ध का समापन हो जाता है।

इस युद्ध की सबसे बढ़ी खासियत यह है कि युद्ध के दौरान पत्थरों से चोटिल हो जाने वाला योद्धा किसी दवा का इस्तेमाल नहीं करता बल्कि बिच्छू घास के उबटन को घाव पर लगाया जाता है।

पाटिया निवासी भगवती प्रसाद पाण्डे ने बताया कि पूर्वजों के दौर से चली आ रही यह परिपाटी जारी है लेकिन युद्ध का आगाज कब से और किस कारण हुआ इस बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। यहां पर यह भी बताना जरूरी है कि सदियों से आपसी आयोजन से चल रही इस परम्परा को उभारने और चम्पावत के देवीधूरा की तर्ज पर इसका प्रचार प्रसार करने के प्रशासनन द्वारा कोई ठोस पहल नहीं की जा सकी है इसीलिए यह आयोजन प्रसिद्धि से दूर है।

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