भारत में टल जाएगा बिजली संकट: अगर AC की एफिशियंसी हो जाए दोगुनी, उपभोक्ताओं के बचेंगे ₹2.5 लाख करोड़; अमेरिकी रिपोर्ट में खुलासा

भारत में मई और जून के महीनों में रातें अब पहले जैसी सुकून भरी नहीं रहीं। रात के ग्यारह-बारह बजे भी कंक्रीट की दीवारें आग…

Air Conditioner

भारत में मई और जून के महीनों में रातें अब पहले जैसी सुकून भरी नहीं रहीं। रात के ग्यारह-बारह बजे भी कंक्रीट की दीवारें आग उगलती हैं। पंखे सिर्फ गर्म हवा फेंकते हैं और महानगरों की सोसाइटियों में इन्वर्टर की लगातार बजती ‘बीप’ आम हो चुकी है। इस जानलेवा गर्मी के बीच एयर कंडीशनर (AC) अब सिर्फ एक “लक्ज़री” या रसूख का प्रतीक नहीं रह गया, बल्कि जिंदा रहने (Survival) का सबसे बड़ा हथियार बनता जा रहा है। मगर सवाल यह है कि अगर आने वाले वर्षों में करोड़ों भारतीय अपने घरों में AC लगाएंगे, तो क्या देश का मौजूदा पावर ग्रिड इस लोड को झेल पाएगा?

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इसी बेहद गंभीर सवाल पर अमेरिका के ‘इंडिया配置 एनर्जी एंड क्लाइमेट सेंटर’ (IECC) ने एक चौंकाने वाली और आंखें खोलने वाली विशेष रिपोर्ट जारी की है। इस अध्ययन का शीर्षक है— “बीटिंग द हीट: हाउ एयर कंडीशनर एफिशियंसी स्टैंडर्ड्स हेल्प इंडिया एवर्ट पावर शॉर्टेज एंड कट कंज्यूमर बिल्स”। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यदि भारत अगले 10 वर्षों में एयर कंडीशनरों की ऊर्जा दक्षता (Energy Efficiency) को दोगुना कर दे, तो देश न केवल एक बहुत बड़े बिजली संकट से बच जाएगा, बल्कि आम उपभोक्ताओं के जेब से जाने वाले करीब ₹2.5 लाख करोड़ रुपये भी बचेंगे।

विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, भारत के भीतर ऊर्जा और पर्यावरण के क्षेत्र में होने वाले आगामी बदलावों के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

जब सूरज डूबता है, तब भारतीय ग्रिड पर आता है ‘महा-लोड’

वर्तमान में भारत में हर साल लगभग 1 से 1.5 करोड़ नए AC बाजारों में बिक रहे हैं। अगले एक दशक में यह आंकड़ा 13 से 15 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। रिपोर्ट के प्रमुख लेखक और यूसी बर्कले (UC Berkeley) के फैकल्टी सदस्य निकित अभ्यंकर के अनुसार, आज की तारीख में अकेले AC भारत की ‘पीक बिजली मांग’ (Peak Power Demand) में 60 से 70 गीगावॉट का योगदान दे रहे हैं।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह लोड दिन में नहीं, बल्कि शाम के बाद आता है। जब सूरज डूबता है, तो सोलर पावर की सप्लाई घट जाती है, लेकिन शहरों की गर्म इमारतें दिन भर की तपन को छोड़ना शुरू करती हैं। ठीक उसी समय करोड़ों घरों में एक साथ AC ऑन होते हैं। यदि हमारी नीतियां नहीं बदलीं, तो AC के कारण बिजली की यह पीक डिमांड साल 2030 तक 120 गीगावॉट और 2035 तक 180 गीगावॉट तक पहुंच जाएगी, जो भारत की कुल अनुमानित पीक मांग का 30 प्रतिशत से भी ज्यादा होगा।

100 बड़े पावर प्लांट लगाने जितनी बिजली बचा सकता है

भारत अध्ययन में एक बेहद दिलचस्प तुलना की गई है। अगर भारत सरकार धीरे-धीरे ज्यादा एफिशिएंट (कम बिजली खाने वाले) AC को देश में अनिवार्य बना देती है, तो साल 2035 तक लगभग 47 गीगावॉट पीक डिमांड को बढ़ने से रोका जा सकता है। यह क्षमता देश में लगभग 100 बड़े पावर प्लांट्स लगाने के बराबर है। यानी, जितनी ऊर्जा हम नए पावर प्लांट लगाकर अरबों रुपये खर्च करके बनाएंगे, उससे कहीं ज्यादा आसानी से हम बिजली को बचाकर ग्रिड को सुरक्षित रख सकते हैं। अभी भारत में शहरी स्तर पर केवल 15 प्रतिशत घरों में ही AC है, जिसका मतलब है कि असली ‘AC बूम’ आना अभी बाकी है।

एफिशिएंट AC का मतलब ‘महंगा’ होना नहीं: अमोल फड़के

आम उपभोक्ताओं के मन में यह डर रहता है कि ज्यादा स्टार रेटिंग या हाई-एफिशिएंसी वाला AC बहुत महंगा होगा। लेकिन इस अध्ययन के सह-लेखक अमोल फड़के ने वैश्विक बाजारों का विश्लेषण कर इस भ्रम को तोड़ा है। उनका कहना है कि तकनीक की कीमत केवल एफिशिएंसी से नहीं बढ़ती, बल्कि बड़े पैमाने पर उत्पादन (Mass Production) और सही सरकारी नीतियों से हाई-एफिशिएंसी वाले AC भी बेहद सस्ते हो जाते हैं। शुरुआती कीमत भले ही थोड़ी ज्यादा हो, लेकिन कम बिजली बिल के कारण उपभोक्ता का वह पैसा महज 2 से 3 साल में वापस (Recover) आ जाता है। अगले दशक में यह तकनीक देश के आम उपभोक्ताओं को ₹90,000 करोड़ से लेकर ₹2.4 लाख करोड़ तक की शुद्ध वित्तीय बचत दे सकती है।

‘Make in India’ के लिए वैश्विक केंद्र बनने का सुनहरा मौका राहत की बात यह है कि भारतीय बाजार पहले ही इस बदलाव को अपना रहा है। देश में बिक रहे 1000 से अधिक AC मॉडल्स पहले से ही मौजूदा 5-Star मानकों से कहीं बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, जिन्हें खुद घरेलू भारतीय कंपनियां बना रही हैं। IECC के शोधकर्ता जोस डोमिंगुएज़ इसे भारत के लिए एक बड़ा औद्योगिक अवसर मानते हैं। उनका कहना है कि यदि सरकार से सही नीतिगत संकेत मिले, तो भारत दुनिया भर के लिए कम लागत वाले ‘High-Efficiency AC’ का एक बड़ा ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनकर उभर सकता है।

सुविधा नहीं, अब स्वास्थ्य और कार्यक्षमता की जरूरत है

AC इस पूरी रिपोर्ट का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि बदलती जलवायु के बीच भारत में अब कुलिंग (Cooling) सिर्फ एक आरामदेह सुविधा नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर नागरिकों के स्वास्थ्य, उनकी रात की अच्छी नींद और अगले दिन काम करने की मानवीय क्षमता (Productivity) से जुड़ चुकी है। भारत को अब यह तय करना है कि वह भविष्य में बढ़ती गर्मी का मुकाबला ज्यादा से ज्यादा कोयला जलाकर और प्रदूषण बढ़ाकर करेगा, या फिर कम बिजली में ज्यादा राहत देने वाली आधुनिक तकनीकों को अपनाकर देश को ‘कूल’ रखेगा।

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