ताकुला विकासखंड में आयोजित हुई वनाग्नि चौपाल, नोडल अधिकारी गजेंद्र पाठक बोले- चीड़ या पीरुल नहीं बल्कि मानवीय भूल है जंगलों की आग का मुख्य कारण

अल्मोड़ा। जिलाधिकारी अंशुल सिंह के निर्देशों के क्रम में मंगलवार 19 मई 2026 को विकासखंड ताकुला के सभागार में एक महत्वपूर्ण ‘वनाग्नि चौपाल’ का आयोजन…

gajendra kumar pathak
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अल्मोड़ा। जिलाधिकारी अंशुल सिंह के निर्देशों के क्रम में मंगलवार 19 मई 2026 को विकासखंड ताकुला के सभागार में एक महत्वपूर्ण ‘वनाग्नि चौपाल’ का आयोजन किया गया। कार्यशाला में ब्लॉक और ग्राम पंचायत स्तरीय वनाग्नि समितियों के सदस्यों सहित विभिन्न जन प्रतिनिधियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

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खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) ताकुला केशर सिंह बिष्ट ने बताया कि चौपाल के दौरान जंगलों में लगने वाली आग से जल स्रोतों, अमूल्य जैव विविधता तथा पारिस्थितिकीय तंत्र (इकोसिस्टम) को हो रहे भारी नुकसान, लगातार बढ़ रहे मानव-वन्यजीव संघर्ष और वनाग्नि नियंत्रण के उपायों पर विस्तार से मंथन किया गया।

चौपाल के दौरान जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) और ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभावों को रोकने के लिए जंगलों को सुरक्षित रखने पर विशेष जोर दिया। बीडीओ ने सभी जन प्रतिनिधियों और विभागीय कर्मचारियों का आह्वान किया कि वे मिलकर यह सुनिश्चित करें कि मई और जून के इस संवेदनशील महीने में नाप खेतों या आबादी वाले क्षेत्रों से आग किसी भी सूरत में वन क्षेत्र तक न पहुंचे।


400 कर्मचारियों के भरोसे 1.30 लाख हेक्टेयर जंगल बचाना नामुमकिन, जनसहभागिता जरूरी

वनाग्नि चौपाल में मुख्य वक्ता, सहायक नोडल अधिकारी (वनाग्नि) एवं शीतलाखेत मॉडल के संयोजक गजेंद्र कुमार पाठक ने पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन (PPT) के माध्यम से वनाग्नि के कारणों और मानव जीवन पर इसके गंभीर प्रभावों की जानकारी दी। उन्होंने स्याहीदेवी-शीतलाखेत क्षेत्र में वन विभाग और जनता के सहयोग से किए जा रहे सफल वनाग्नि प्रबंधन के उदाहरण भी सामने रखे। गजेंद्र पाठक ने एक महत्वपूर्ण बात साझा करते हुए कहा कि जंगलों में आग लगने का मुख्य कारण चीड़, पीरुल या सूखी घास नहीं है, बल्कि इंसानों की लापरवाही और मानवीय हस्तक्षेप ही वनाग्नि की घटनाओं के लिए जिम्मेदार है।


उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि अल्मोड़ा जिले में लगभग 1 लाख 30 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में सिविल, पंचायती और आरक्षित वन फैले हुए हैं। इतने बड़े भू-भाग को आग से बचाने के लिए वन विभाग के पास महज 400 वन बीट अधिकारी और फायर वाचर्स ही तैनात हैं। इतने कम स्टाफ के भरोसे इतने विशालकाय जंगलों को सुरक्षित रखना बेहद चुनौतीपूर्ण है, इसलिए जंगलों को बचाने के लिए आम जनता का सहयोग और जनसहभागिता सबसे ज्यादा जरूरी है।


वनाग्नि चौपाल में नरेंद्र सिंह बोरा, राजा यादव, विजय कैड़ा, महेंद्र सिंह बोरा, संदीप कुमार, वैश मोहम्मद, मोहित कुमार आर्या, हुकुम सिंह कुर्याबी, भावना आर्या, कपिल पांडे, गिरीश चंद्र भट्ट, भुवन चंद्र आर्या, मनोज कुमार वर्मा, संतोष लोहनी, अर्जुन कुमार, अजय कुमार, भूपाल सिंह, सूरज बिष्ट, जलज पंत, जगदीश दानू, अमित खड़ाई, कुंवर पाल सहित पंचायतीराज, ग्राम्य विकास, अग्निशमन और वन विभाग से जुड़े तमाम अधिकारी, कर्मचारी और स्थानीय जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे। उत्तराखंड की अन्य मुख्य खबरों के लाइव अपडेट्स के लिए यहाँ क्लिक करें।

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