आजकल सोशल मीडिया खोलो तो उत्तराखंड की बर्फबारी के वीडियो छाए हुए हैं। कोई बर्फ में डांस कर रहा है, तो कोई स्नोमैन के साथ सेल्फी ले रहा है। पर्यटकों के लिए ये बर्फ ‘रोमांच’ है, लेकिन पहाड़ के लोगों के लिए? भाई साहब, ये ‘अग्निशमन’ वाली आफत है।जो आप ये इंस्टाग्राम वाली रील्स देख-देख कर ‘वाओ’ और ‘सो ब्यूटीफुल’ चिल्लाते हो न, ज़रा रुकिए। असली पहाड़ की तस्वीर स्नोमैन बनाने और बर्फ के गोले फेंकने जितनी गुलाबी नहीं है।
ये वीडियो पिथौरागढ़ के दुमक गांव का है। जहाँ आप जैसे लोग जैकेट पहनकर हॉट चॉकलेट की चुस्की लेते हैं, वहाँ यहाँ की माताएं-बहनें कमर तोड़ मेहनत कर रही हैं। इनके लिए बर्फबारी कोई उत्सव नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की जंग है।
बर्फ में खेल नहीं, ज़िम्मेदारी का ‘पहाड़’
इन महिलाओं के पास रील बनाने का टाइम नहीं है। जब पारा शून्य से नीचे चला जाता है, तब ये महिलाएं अपनी जान हथेली पर रखकर फिसलन भरे पहाड़ों पर चढ़ती हैं। क्यों? क्योंकि अगर पशुओं के लिए घास नहीं लाए, तो बर्फ गिरने से वो घास सड़ जाएगी। और अगर घास सड़ गई, तो घर की ‘लाइफलाइन’ यानी मवेशी भूखे मर जाएंगे।
असली ‘इन्फ्लुएंसर’ तो ये हैं
पहाड़ में गाड़ी-बंगला नहीं, बल्कि पशुधन ही असली तिजोरी है। दूध, दही और खेती—सब इन्हीं से है। जिस रास्ते पर सैलानी दो कदम चलने में फिसल जाते हैं, वहाँ ये महिलाएं भारी-भरकम घास का गट्ठर लेकर चलती हैं। शहरों में जिसे हम ‘विंटर वंडरलैंड’ कहते हैं, यहाँ की महिलाओं के लिए वो ‘संघर्ष की चादर’ है।
पहाड़ की ये हकीकत किसी इंस्टाग्राम फिल्टर से सुंदर नहीं बनाई जा सकती। ये वीडियो उन लोगों के गाल पर तमाचा है जो पहाड़ को सिर्फ पिकनिक स्पॉट समझते हैं। पहाड़ की असली तस्वीर रील में नहीं, इन महिलाओं की फटी हुई बिवाइयों और कड़ाके की ठंड में पसीने बहाने वाली मेहनत में दिखती है।
