उत्तराखंड में कैंसर को नोटिफाइड बीमारी घोषित करने की तैयारी, पहाड़ों की महिलाएं तेजी से आ रहीं चपेट में

देहरादून में कैंसर को लेकर हालात लगातार चिंता बढ़ा रहे हैं। दुनिया की सबसे घातक बीमारियों में गिने जाने वाले कैंसर के प्रति जागरूक करने…

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देहरादून में कैंसर को लेकर हालात लगातार चिंता बढ़ा रहे हैं। दुनिया की सबसे घातक बीमारियों में गिने जाने वाले कैंसर के प्रति जागरूक करने के लिए हर साल 4 फरवरी को विश्व कैंसर दिवस मनाया जाता है।

डॉक्टरों के अनुसार कैंसर का उपचार तभी कारगर साबित होता है, जब मरीज शुरुआत में ही अस्पताल पहुंच जाए, लेकिन उत्तराखंड में हालात अक्सर इसके उलट देखने को मिलते हैं।
पर्वतीय जिलों से कई ऐसे मरीज सामने आते हैं, जो बीमारी के दूसरे या तीसरे चरण में पहुंचने के बाद ही जांच कराते हैं। इसी बढ़ती गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार अब कैंसर को अधिसूचित रोग की सूची में जोड़ने जा रही है, ताकि कैंसर मरीजों का वास्तविक और अद्यतन रिकॉर्ड उपलब्ध हो सके।

राज्य में अभी कैंसर नोटिफाइड डिजीज की श्रेणी में नहीं है, जिसके कारण विभाग के पास सटीक आंकड़े मौजूद नहीं हैं। इसी कमी को दूर करने के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत 30 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की स्क्रीनिंग बड़े स्तर पर शुरू की गई है। स्क्रीनिंग मुख्य रूप से मुंह, स्तन और सर्वाइकल कैंसर पर केंद्रित है और इसे प्रदेश के 1,554 आरोग्य मंदिरों में तैनात स्वास्थ्यकर्मी संचालित कर रहे हैं।

ओरल कैंसर में अब तक 30 लाख से अधिक लोगों की जांच की जा चुकी है, जिनमें 124 लोगों में बीमारी की पुष्टि हुई है। ब्रेस्ट कैंसर की स्क्रीनिंग में भी 30 महिलाओं, जबकि सर्वाइकल कैंसर में 30 महिलाओं में कैंसर का पता चल चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि पहाड़ी इलाकों में रहने वाली महिलाएं जागरूकता की कमी के कारण देर से जांच कराती हैं और इसलिए सबसे अधिक प्रभावित हो रही हैं।

दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल के रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग के आंकड़े भी स्थिति की गंभीरता दर्शाते हैं। पिछले पांच वर्षों में करीब 15,000 से अधिक कैंसर मरीज ओपीडी में पहुंचे हैं और तीन हजार से ज्यादा को भर्ती कर इलाज करना पड़ा है। पिछले कुछ वर्षों में कैंसर के मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है।

स्वास्थ्य सचिव सचिन कुर्वे का कहना है कि उत्तराखंड में कैंसर मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए विभाग एक टीम को टाटा कैंसर इंस्टीट्यूट और नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट भेज रहा है। टीम वहां की सुविधाओं का अध्ययन करेगी, ताकि राज्य में मौजूद इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर ढंग से इस्तेमाल किया जा सके। विभाग पीपीपी मॉडल पर भी काम कर रहा है, जिससे हरिद्वार और देहरादून में तैयार की गई सुविधाएं अधिक प्रभावी तरीके से उपयोग में लाई जा सकें।

दून मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों का कहना है कि महिलाओं में स्तन और सर्वाइकल कैंसर के मामले सबसे अधिक देखे जा रहे हैं। पहाड़ों में रहने वाली महिलाओं में जागरूकता की कमी प्रमुख कारण माना जा रहा है। वहीं पुरुषों में मुंह, गला, फेफड़े और आहार नाल कैंसर के मामले ज्यादा बताए जा रहे हैं।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि कैंसर अब सिर्फ वृद्धावस्था की बीमारी नहीं रही। 40 से 60 वर्ष की आयु के बीच के लोगों में इसकी पहचान तेजी से बढ़ी है। लाइफस्टाइल में बदलाव, तंबाकू-स्मोकिंग की आदतें, शराब का सेवन और फास्ट फूड की ओर बढ़ता रुझान इसके प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं।

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