भारत ने डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में ऐसी रफ़्तार पकड़ी है कि अब दुनिया की कई संस्थाएं भी इसे मानने लगी हैं। देश का एकीकृत भुगतान इंटरफेस यानी यूपीआई यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस आज न सिर्फ़ सफल माना जा रहा है, बल्कि उसने यह भी साबित किया है कि सरकारी ढांचा भी अंतरराष्ट्रीय निजी नेटवर्कों को चुनौती दे सकता है।
इंटरेस्ट एनजेड की एक रिपोर्ट के अनुसार, जहां अमेरिका में वीज़ा वीज़ा और मास्टरकार्ड मास्टरकार्ड जैसी सेवाएं निजी ढांचे पर आधारित हैं, वहीं भारत ने अपने डिजिटल भुगतान को सार्वजनिक व्यवस्था के रूप में विकसित किया है। इसी वजह से यूपीआई आम लोगों के लिए लगभग निशुल्क उपलब्ध है। छोटे कारोबारियों से लेकर बड़े व्यापारियों तक, सभी आसानी से इसका उपयोग कर रहे हैं, जिससे लेनदेन पहले से अधिक तेज़, आसान और सुरक्षित हो गया है।
रिपोर्ट में भारतीय रिज़र्व बैंक भारतीय रिज़र्व बैंक के आँकड़ों का भी उल्लेख किया गया है। इन आँकड़ों से पता चलता है कि देश में होने वाले कुल डिजिटल लेनदेन का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अब यूपीआई के माध्यम से होता है। कुछ वर्षों पहले तक जहां लगभग तीन करोड़ लोग यूपीआई का उपयोग कर रहे थे, वहीं अब यह संख्या चालीस करोड़ से ऊपर पहुंच चुकी है। इसके साथ ही देश में हर वर्ष सत्रह अरब से अधिक यूपीआई लेनदेन दर्ज किए जा रहे हैं, जो डिजिटल बदलाव की बड़ी मिसाल माने जा रहे हैं।
रिपोर्ट में भारत की तुलना चीन के भुगतान माध्यम अलीपे अलीपे और वीचैट पे वीचैट पे से भी की गई है। चीन के ये माध्यम सीमित दायरे में काम करते हैं और बंद ढांचे पर आधारित हैं। इसके विपरीत भारत का यूपीआई खुले ढांचे पर चलता है, जिसका अर्थ है कि कोई भी बैंक या वित्तीय कंपनी इससे जुड़कर अपने ग्राहकों को सेवा दे सकती है। यही सरलता और खुलापन यूपीआई को तेजी से लोकप्रिय बना रहा है।
भारत ने यह दिखाया है कि कम लागत में भी बड़े स्तर पर डिजिटल सेवाएं दी जा सकती हैं। यूपीआई ने देश में वित्तीय पहुंच बढ़ाई है और दुनिया के सामने एक नया मानक स्थापित किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में वैश्विक डिजिटल वित्त व्यवस्था में भारत की भूमिका और प्रभावशाली होगी और डिजिटल लेनदेन की नई दिशा भारत से तय होती दिखाई दे रही है।
