उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले से सामने आई एक दर्दनाक घटना ने समाज को झकझोर कर रख दिया है। साहिबाबाद की एक ऊंची रिहायशी सोसाइटी में रहने वाली तीन सगी नाबालिग बहनों ने घर में ही अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। यह मामला सिर्फ एक परिवार का निजी शोक नहीं, बल्कि यह संकेत भी देता है कि आधुनिक डिजिटल माहौल बच्चों के लिए कितना जोखिम भरा हो सकता है।
पुलिस जांच में सामने आया है कि तीनों बहनें काफी समय से एक ऑनलाइन कोरियन लव गेम से जुड़ी हुई थीं। बताया जा रहा है कि ये लड़कियां दिन रात उसी वर्चुअल दुनिया में उलझी रहती थीं। धीरे-धीरे उनका वास्तविक सामाजिक जीवन बिल्कुल फीका पड़ गया था। न वे स्कूल में दिलचस्पी ले रही थीं और न ही रिश्तेदारों से कोई खास संपर्क रखती थीं। परिवार वालों के अनुसार, तीनों बहनों ने अपने नाम तक बदलकर कोरियन शैली के मुताबिक रखने शुरू कर दिए थे और वे उसी संस्कृति को अपनाने लगी थीं।
जानकारी के अनुसार, पिता द्वारा मोबाइल फोन सीमित करने और गेमिंग की आदत पर रोक लगाने के बाद तीनों बच्चियों का तनाव और बढ़ गया। परिजन बताते हैं कि फोन बंद होने के बाद वे चुप रहने लगीं और उनके व्यवहार में बेचैनी दिखाई देने लगी। इसी दबाव के बीच उन्होंने यह बेहद दर्दनाक कदम उठाया। पुलिस ने कमरे से एक नोट बरामद किया है जिसमें उन्होंने माता-पिता से माफी मांगते हुए लिखा है कि वे इस गेम की गिरफ्त से खुद को मुक्त नहीं कर पा रही थीं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि टास्क आधारित कोरियन लव गेम सामान्य गेम्स से बिल्कुल अलग होता है। इसमें सोशल मीडिया या चैट के जरिए कोई व्यक्ति खुद को कोरियन बताकर बच्चों से जुड़ता है और धीरे-धीरे भरोसा जीत लेता है। इसके बाद उन्हें टास्क दिए जाते हैं, जिनकी शुरुआत हल्के कामों से होती है लेकिन आगे चलकर ये टास्क मानसिक रूप से भारी पड़ने लगते हैं। कई बार बच्चों को इस खेल से हटने पर डराया या धमकाया भी जाता है, जिससे वे मानसिक तनाव में जकड़ जाते हैं।
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि किशोर उम्र में दिमाग बहुत नाजुक अवस्था में होता है। ऐसे में ऑनलाइन गेम्स और वर्चुअल दोस्ती उन्हें गहराई से प्रभावित कर देती है। लगातार दबाव, टास्क पूरा करने की मजबूरी और गेम छोड़ने का भय उनके आत्मविश्वास और निर्णय क्षमता को कम कर देता है। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि डिजिटल लत अवसाद, घबराहट और आत्मघाती प्रवृत्ति जैसी समस्याओं को जन्म दे सकती है।
जानकारों के अनुसार, अगर बच्चा हर वक्त मोबाइल में खोया रहे, गेम बंद करने पर झुंझलाहट दिखाए, घर-परिवार से दूरी बनाने लगे, नींद की आदतें बिगड़ जाएं या पढ़ाई में मन न लगे, तो तुरंत ध्यान देना जरूरी है। लगातार खालीपन या डर महसूस करना भी गंभीर चेतावनी मानी जाती है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि बच्चों को स्मार्टफोन देना गलत नहीं, लेकिन उसके इस्तेमाल पर निगरानी बेहद जरूरी है। माता-पिता को बच्चों से खुलकर बात करनी चाहिए और उनकी ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए।
पेरेंटल कंट्रोल और सीमित स्क्रीन टाइम जैसे उपाय बच्चों को खतरनाक गेम्स और मानसिक दबाव पैदा करने वाली डिजिटल गतिविधियों से दूर रखने में मदद कर सकते हैं।
