अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर हमला शुरू होने के बाद पिछले चार हफ्तों में अपने उद्देश्यों में कई बार बदलाव किया है। फिर भी, उनका मुख्य लक्ष्य हमेशा एक जैसा रहा ईरान के परमाणु हथियार कार्यक्रम को पूरी तरह विफल करना और यह सुनिश्चित करना कि तेहरान के पास कभी भी परमाणु हथियार न हों।
विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया में यह संघर्ष दुनिया भर में परमाणु हथियारों की नई होड़ को बढ़ावा दे सकता है, जिसे रोकना आसान नहीं होगा। अमेरिकी सैन्य कार्रवाई फिलहाल ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को रोक सकती है, लेकिन यदि शासन बच गया, तो वह और भी मजबूती से परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश करेगा।
ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के क्रॉफोर्ड स्कूल के परमाणु अप्रसार और निरस्त्रीकरण केंद्र के निदेशक रमेश ठाकुर का कहना है कि ईरान के लिए परमाणु हथियार अब शासन के अस्तित्व की सबसे बड़ी गारंटी बन चुके हैं। वे चेतावनी देते हैं कि केवल ईरान ही खतरा नहीं है, बल्कि इससे एक ऐसा परमाणु जिन्न दुनिया में निकल सकता है जिसे वापस नियंत्रित करना मुश्किल होगा।
उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन ने हाल ही में ईरान युद्ध का हवाला देते हुए कहा कि उनके देश के लिए परमाणु हथियार बनाए रखना सही निर्णय था। उन्होंने लीबिया के मुअम्मर गद्दाफी और इराक के सद्दाम हुसैन का उदाहरण देते हुए बताया कि दोनों ने अपने परमाणु कार्यक्रम छोड़ने के बाद सत्ता गंवाई।
सोवियत संघ के विघटन के बाद यूक्रेन द्वारा स्वेच्छा से परमाणु हथियार छोड़ने का अनुभव भी अब दुनिया के लिए एक सबक बन गया है।
इससे यह स्पष्ट हो गया है कि वास्तविक संघर्ष के समय अमेरिका और यूरोप की सुरक्षा गारंटी का कोई खास महत्व नहीं रह जाता।
इसके अलावा, ईरान पर युद्ध ने अमेरिका के सहयोगियों और अन्य देशों को भी अपने परमाणु सुरक्षा विकल्पों पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। ट्रंप के आक्रामक रवैये से यूरोप पहले ही सतर्क हो गया है, और अब रूस के खिलाफ नए सुरक्षा गठबंधनों पर चर्चा तेज हो रही है।

