अल्मोड़ा/लमगड़ा: पहाड़ के संघर्षों के बीच से जब सफलता की ऐसी कहानी निकलती है, तो पूरी दुनिया नतमस्तक हो जाती है। लमगड़ा के एक छोटे से गांव छाना ढौरा में आज उस समय जश्न का माहौल तब बन गया जब राजकीय प्राथमिक विद्यालय के छात्र आर्यन कुमार का देश के प्रतिष्ठित सैनिक स्कूल घोड़ाखाल में चयन होने की खबर सामने आई।
सीधा प्रहार: ‘टैक्सी’ की कमाई और ‘अफसर’ बनने का सपना!
आर्यन के पिता कमल कुमार दिन-रात टैक्सी चलाकर परिवार की गाड़ी खींचते हैं, लेकिन उनके दिल में एक ही अरमान था कि उनका बेटा वो मुकाम हासिल करे जहाँ उसे किसी के आगे झुकना न पड़े। आज आर्यन ने घोड़ाखाल में चयन पाकर उस सिस्टम को आईना दिखा दिया है जो सरकारी स्कूलों को ‘सफेद हाथी’ मान चुका था। 5वीं कक्षा के इस छोटे से बच्चे ने साबित कर दिया कि असली ‘दम’ टाट-पट्टी पर बैठकर गणित के सवाल सुलझाने में है, न कि एयरकंडीशनर कमरों में बैठकर रट्टा मारने में।
डबल अटैक: बेमिसाल प्रतिभा बनाम अभावों का तमाशा
आर्यन बचपन से ही प्रतिभा का धनी रहा है। उसने अपनी सफलता का श्रेय अपने गुरुजनों और उन बुजुर्गों (दादा-दादी) को दिया है जिन्होंने अभावों के बीच भी उसकी पढ़ाई की लौ बुझने नहीं दी।
सरकारी स्कूल की ‘नजीर’: जहाँ एक ओर सरकारी स्कूलों में ताले लटकने की खबरें आती हैं, वहीं छाना ढौरा के प्राथमिक विद्यालय ने यह नजीर पेश की है कि अगर शिक्षक ठान लें, तो पहाड़ का हर बच्चा ‘अधिकारी’ बन सकता है। आखिर क्यों हमारा महकमा इन स्कूलों को वो सुविधाएं नहीं दे पाता जिनकी ये हकदार हैं?
जैसे ही ढौरा गांव में खबर फैली कि कमल का लाड़ला अब घोड़ाखाल जाएगा, पूरे लमगड़ा ब्लॉक में खुशी की लहर दौड़ गई। एक वाहन चालक के लिए इससे बड़ा ‘रिवॉर्ड’ क्या होगा कि जिस सड़क पर वह कल तक सवारियां ढोता था, आज उसी सड़क पर लोग उसके बेटे की कामयाबी की मिसालें दे रहे हैं।
आर्यन ने तो स्टेयरिंग से सीधा ‘सैनिक स्कूल’ तक का सफर तय कर लिया, लेकिन क्या हमारा प्रशासन ऐसे होनहारों की आगे की राह आसान करेगा? वाह-वाही लूटने वाले नेताओं और अधिकारियों से सवाल है कि क्या वे उन सरकारी स्कूलों की सुध लेंगे जहाँ आज भी हजारों ‘आर्यन’ अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं? शाबाश आर्यन, तुमने आज बता दिया कि पहाड़ का पानी और जवानी दोनों में अभी बहुत जान बाकी है।
