भारत में सोशल मीडिया के लगातार फैलते प्रभाव और कम उम्र के बच्चों में बढ़ती डिजिटल लत को देखते हुए सरकार अब उम्र के आधार पर नए नियम लागू करने की दिशा में कदम बढ़ा सकती है। देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि छोटे बच्चों और किशोरों के लिए सोशल मीडिया की पहुंच सीमित करना भविष्य में जरूरी हो सकता है।
इकोनॉमिक सर्वे में यह भी चेतावनी दी गई है कि युवा उपयोगकर्ता, खासकर कम उम्र के बच्चे, सोशल मीडिया के अत्यधिक इस्तेमाल और हानिकारक सामग्री के प्रभाव के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं। ऐसे में उम्र तय कर एक्सेस लिमिट बनाना और सोशल मीडिया कंपनियों को एज वेरिफिकेशन से लेकर बच्चों के लिए सुरक्षित डिफॉल्ट सेटिंग अनिवार्य करना नीति का हिस्सा हो सकता है।
मुख्य आर्थिक सलाहकार ने यह भी कहा कि परिवारों को अपनी भूमिका समझनी होगी। स्क्रीन टाइम कम करने, कुछ समय को पूरी तरह डिवाइस-फ्री रखने और बच्चों को ऑफलाइन गतिविधियों से जोड़ने जैसी आदतें उन्हें डिजिटल निर्भरता से बचा सकती हैं।
भारत फिलहाल सोशल मीडिया कंपनियों के लिए बेहद बड़ा प्लेटफॉर्म है। देश में लगभग 75 करोड़ स्मार्टफोन और करीब एक अरब इंटरनेट यूजर्स मौजूद हैं, लेकिन सोशल मीडिया इस्तेमाल करने की न्यूनतम उम्र को लेकर कोई स्पष्ट राष्ट्रीय नियम तय नहीं है। दुनिया के कई देश पहले ही इस दिशा में कदम उठा चुके हैं—ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने का प्रावधान लागू किया है, जबकि फ्रांस 15 साल से कम उम्र वालों पर बैन की तैयारी में है। ब्रिटेन, डेनमार्क और ग्रीस भी इसी मुद्दे पर नीतियां बना रहे हैं।
इकोनॉमिक सर्वे में यह भी सामने आया है कि स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले युवाओं में करीब आधे डिजिटल प्लेटफॉर्म को पढ़ाई के लिए इस्तेमाल करते हैं, जबकि लगभग 75 प्रतिशत सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताते हैं। रिपोर्ट बताती है कि डिजिटल लत बच्चों की पढ़ाई, नींद, कामकाज और एकाग्रता पर नकारात्मक असर छोड़ती है।
हालांकि मुख्य आर्थिक सलाहकार की ये सिफारिशें सरकार पर लागू करना अनिवार्य नहीं है, लेकिन नीतियों के निर्धारण में इन्हें गंभीरता से देखा जाता है।
इसी बीच, गोवा और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने भी बच्चों के स्क्रीन टाइम और सोशल मीडिया उपयोग पर अध्ययन शुरू कर दिया है।
