लक्ष्मी आश्रम, कौसानी निवासी डेविड भाई (डेविड होपकिन्स) नहीं रहे।
वो एक महान पर्यावरणप्रेमी व भूगोलविद् थे। बीते सोमवार प्रातः 4 बजे अपने निवास स्थान लक्ष्मी आश्रम में उनका देहावसान हो गया।
यूरोप के मूल निवासी डेविड भाई
नौजवानी में भारत ऐसे आए कि यहीं के होकर रह गए। फिर लक्ष्मी आश्रम की कार्यकर्ता हंसी बहन को अपनी जीवन संगिनी बना लिया। दोनों ने गांधी के काम में अपने को लगा दिया।
78 वर्ष की आयु में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया।
आश्रम की ओर से बताया गया है कि डेविड रविवार को डेविड भाई आश्रम में ही गिर गए थे, लेकिन मामूली चोट आई थी। उन्होंने रात का नियमित भोजन लिया था और फिर टी 20 क्रिकेट मैच भी टेलिविजन पर देखा था।
देर रात उन्होंने कुछ बेचैनी महसूस की और चार बजे भोर में आखिरी सांस ले ली। राधा बहन ने बताया कि डेविड भाई की बेटी लंदन से लौटने के बाद मंगलवार को बागेश्वर उनका अंतिम संस्कार होगा। शव यात्रा बागेश्वर के लिए निकल चुकी थी।
उनके निधन की सूचना के बाद देश भर के सामाजिक कार्यकर्ताओं, पर्यावरण प्रेमियों, भूगोलविदों में अजानक बैचेनी-सी हो गयी।
पिछले पांच दसक में हुये पर्यावरणीय बदलाओं के वो एक जीवंत गवाह थे। लक्ष्मी आश्रम कौसानी में उन्होंने दसकों सेवायें दी। वो सेवायें जो उनके विद्यार्थियों, पर्यावरण प्रेमियों व भूगोल विदों के साथ-साथ गांधीवादी विचारकों व कार्यकर्ताओं के मनों मे अमिट छाप छोड़ गयी। शांत स्वभाव, सादगीपूर्ण जीवन और अपने काम के प्रति गहरी निष्ठा के कारण वे सबके प्रिय थे।
सामाजिक कार्यकर्ता बसंत पांडे ने बताया कि
डेविड जेरार्ड हॉपकिंस यानि डेविड भाईजी का जन्म 9 दिसंबर 1947 को लंदन में विनीफ्रेड और ग्लिन हॉपकिंस के घर हुआ था।
मिडलसेक्स और केंट के स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करने के बाद, उन्होंने 1969 में ब्रिस्टल विश्वविद्यालय से भूगोल में बीए ऑनर्स और 1971 में लीड्स विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट सर्टिफिकेट ऑफ एजुकेशन प्राप्त किया। यात्रा और पहाड़ों के प्रति उनके प्रेम ने उन्हें पहले वेल्सए स्कॉटलैंडए नॉर्वे और अंत में 1969 में भारत की यात्रा पर ले आया। गांधीजी के शिक्षा संबंधी आदर्शों से प्रेरित होकर वे पहली बार 1972 में कौसानी आए और 1981 में स्थायी रूप से बस गए। कुछ दसक पहले उन्हें भारत की नागरिकता भी मिल गयी।
डेविड भाई का जन्म भले ही लंदन में हुआ हो, लेकिन उनके जीवन का बड़ा हिस्सा हिमालय और यहाँ के लोगों के बीच बीता। भूगोल के छात्र होने के कारण उनका प्रकृतिए पर्यावरण एवं उनके विकास अथवा विनाश का बहुत गहरा ज्ञान था। लक्ष्मी आश्रम में बिताए उनके लंबे वर्ष उनके समर्पण और लगाव के साक्षी हैं। इस क्षेत्र की प्रकृतिए समाज और जीवन को उन्होंने बहुत निकट से समझा और अपनाया। उनके पास भूगोल, पर्यावरण, और अपनी यात्रों का खज़ाना अभी भी मौजूद है। भारत की नागरिकता मिलने के बाद वो भारत के नागरिक ही बन गए थे।
लक्ष्मी आश्रम परिवार के साथ उनका रिश्ता केवल कार्य तक सीमित नहीं थाए बल्कि उसमें गहरा अपनापन भी था। अपनी सादगी, संवेदनशीलता और गंभीर चिंतन के कारण उन्होंने आश्रम परिवार में एक विशेष स्थान बनाया। लम्बे समय तक लक्ष्मी आश्रम द्वारा संचालित खादी दुकानों व खादी के प्रसार में उनकी विशेष भूमिका व जुड़ाव रहा।
उनके पास प्रति दिन वर्षा, बर्फ और तापमान का सटीक डाटा हमेशा से रहा है। उनके द्वारा पहाड़ों की यात्रा संस्मरण बहुत ही ज्ञानवर्धक थे। हालांकि उनका उपयोग अभी तक नहीं हो पाया। सरला बहन की जीवनी की अंग्रेजी में अनुवाद कर उन्होंने उनके विचारों को देश विदेश तक प्रेषित किया।
उन्होंने बताया कि राधा बहन के साथ लक्ष्मी आश्रम के संचालन में अपनी शानदार भूमिका निभाई। प्रतिदिन ठीक समय पर ऑफिस आना लक्ष्मी आश्रम की छात्राओं को पढ़ाना और शाम को प्रार्थना में शामिल होना, उनकी दिनचर्या रही। पिछले कुछ समय से वो कुछ धीमे होते गए लेकिन फिर भी अपने कामों को सुचारू रूप से किया करते थे।
