अल्मोड़ा के महर्षि विद्या मंदिर में गुरु पूर्णिमा पर गुरु पूजन के साथ हस्तशिल्प जागरूकता कार्यक्रम का हुआ शुभारंभ

अल्मोड़ा। सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा के पपरसली स्थित महर्षि विद्या मंदिर में गुरु पूर्णिमा का पर्व श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर…

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अल्मोड़ा। सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा के पपरसली स्थित महर्षि विद्या मंदिर में गुरु पूर्णिमा का पर्व श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर विद्यालय परिसर में वैदिक गुरु पूजन के साथ-साथ हस्तशिल्प आधारित तीन दिवसीय जागरूकता कार्यक्रम एवं प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को समृद्ध भारतीय संस्कृति, सनातन गुरु-शिष्य परंपरा और आधुनिक युग में कौशल विकास के व्यावहारिक महत्व से परिचित कराना रहा।

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समारोह की शुरुआत दैनिक मंत्रोच्चार, दीप प्रज्ज्वलन, गुरु पूजन और भावातीत ध्यान के साथ हुई। विद्यालय के प्रधानाचार्य अंकित जायसवाल ने मुख्य अतिथि कैलाश चंद जोशी का स्वागत किया। अपने संबोधन में प्रधानाचार्य ने कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोच्च है। उन्होंने छात्र-छात्राओं से जीवन में अनुशासन, उच्च नैतिक मूल्यों और प्राचीन आदर्शों को आत्मसात करने का आह्वान किया। मुख्य अतिथि कैलाश चंद जोशी ने कहा कि गुरु का सही मार्गदर्शन ही विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण और स्वर्णिम भविष्य की मजबूत नींव रखता है।

कार्यक्रम में शिक्षक विद्या सागर उप्रेती, विनोद कुमार यादव, अष्टांग योग शिक्षिका शालिनी शर्मा और रमेश मेर ने भी विद्यार्थियों को संबोधित किया, जबकि छात्र-छात्राओं ने गुरु महिमा पर भाषण, भजन, दोहे व मनमोहक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं।स्कूल के बच्चों के रंगारंग कार्यक्रम की प्रस्तुतियों से लोगों का मन मोह लिया।

guru purnima and handicrafts awareness program organized at maharishi vidya mandir almora 1


इसी आयोजन की कड़ी में भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के तत्वावधान में विकास आयुक्त (हस्तशिल्प), हस्तशिल्प सेवा केंद्र अल्मोड़ा की ओर से तीन दिवसीय हस्तशिल्प प्रदर्शनी सह जागरूकता शिविर भी शुरू हुआ। हस्तशिल्प संवर्धन अधिकारी भूमिका गर्ब्याल ने कहा कि हर बच्चे में कोई न कोई मौलिक प्रतिभा छिपी होती है, जिसे उचित मंच और मार्गदर्शन से निखारा जा सकता है।

शिविर में मास्टर ट्रेनर सुनीता मलिक, कृपाल, कंचन, गीता और मनोज ने विद्यार्थियों को पारंपरिक हस्तशिल्प कौशलों और उत्पादों की बारीकियां सिखाईं। विद्यालय प्रबंधन ने जोर देकर कहा कि ऐसे सह-शैक्षणिक आयोजन बच्चों के सर्वांगीण विकास के साथ-साथ उन्हें पारंपरिक कलाओं और भविष्य में स्वरोजगार की संभावनाओं से जोड़ते हैं।

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