पाकिस्तान में जंग रोकने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच चल रही 21 घंटे लंबी मध्यस्थता वार्ता बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई है। दोनों देश अपनी अपनी शर्तों पर अड़े रहे। हालात देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल अपने प्वाइंटस पर ही बात करने के लिए आया था। अमेरिका का पूरा जोर बिना शर्त होर्मुज स्ट्रेट को खोलने पर था, जबकि ईरान अपने सहयोगियों के नुकसान की भरपाई और भविष्य में युद्ध न थोपने की गारंटी चाहता था।
72 घंटे का खेल और मिनाब स्कूल के बच्चों की याद
सूत्रों के अनुसार अमेरिका शुरुआत में केवल 72 घंटे का युद्धविराम चाहता था जिससे ईरान ने साफ इनकार कर दिया था। इसके बाद अमेरिका ने पाकिस्तान को मध्यस्थ बनाकर दो हफ्ते का सीजफायर करा लिया। जानकारों का मानना है कि अमेरिका ने इस समय का इस्तेमाल मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य ताकत को दोबारा इकट्ठा करने के लिए किया है और वार्ता को विफल बताकर उसका प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान से चला गया है।
वहीं ईरानी प्रतिनिधि अपने साथ मिनाब स्कूल हमले में मारे गए 168 बच्चों की यादें भी लेकर आए थे, ताकि दुनिया को यह संदेश दिया जा सके कि वे शांति चाहते हैं और बच्चों के हत्यारों के साथ भी टेबल पर बैठे हैं।
जेडी वेंस का बयान-ईरान ने नहीं मानी शर्तें
वार्ता विफल होने के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कड़ा बयान दिया है। वेंस ने कहा कि 21 घंटे की चर्चा के बाद भी हम किसी समझौते पर नहीं पहुंच पाए हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने अपनी सीमाएं साफ कर दी थीं, लेकिन ईरान ने हमारी शर्तों को मानने से इनकार कर दिया। वेंस ने बताया कि अमेरिका को ईरान से एक साफ वादा चाहिए कि वह परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश नहीं करेगा और न ही ऐसे साधन तलाशेगा जिनसे जल्द परमाणु हथियार बन सकें। हालांकि वेंस ने मध्यस्थता के लिए पाकिस्तान की तारीफ करते हुए कहा कि वार्ता विफल होने में पाकिस्तान की कोई कमी नहीं थी।
ईरान ने भी रखा अपना पक्ष
दूसरी ओर ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने भी अपना पक्ष दुनिया के सामने रखा है। उन्होंने बताया कि इस लंबी बैठक में कई अहम मुद्दों पर बातचीत हुई है। इनमें ईरान का परमाणु कार्यक्रम, युद्ध का हर्जाना, आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना, होर्मुज स्ट्रेट का मुद्दा और ईरान के खिलाफ युद्ध को पूरी तरह खत्म करने जैसी अहम मांगें शामिल थीं।
अब वार्ता पूरी तरह विफल होने के बाद इस बात की आशंका है कि मिडिल ईस्ट में एक बार फिर भीषण तनाव पैदा होगा और ईरान पर ज्यादा गंभीर हमले हो सकते हैं। यह तय है कि यह 72 घंटे का ब्रेक खाड़ी देशों में एक नई इबारत लिखने जा रहा है।


