उत्तरा न्यूज डेस्क:
अमेरिका और ईरान के बीच 40 दिनों तक चले विनाशकारी युद्ध के बाद अब दो हफ्तों के युद्धविराम (सीजफायर) का ऐलान हो चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसे अपनी आंशिक जीत और बड़ी कूटनीतिक सफलता के रूप में पेश कर रहे हैं। ट्रंप का दावा है कि उन्होंने ईरान को झुका दिया है और होर्मुज स्ट्रेट खुलवा लिया है। लेकिन अगर जमीनी हकीकत और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के चश्मे से देखा जाए तो तस्वीर बिल्कुल उलट नजर आती है। असल में यह ट्रंप की जीत नहीं बल्कि युद्ध के दलदल से बाहर निकलने का एक सुरक्षित और सम्मानजनक रास्ता यानी फेस सेविंग मात्र है।
ईरान का पलड़ा रहा भारी
इस पूरी जंग में अगर निष्पक्ष होकर देखा जाए तो ईरान का ही दबदबा देखने को मिला है। अमेरिका जैसी सुपरपावर के ताबड़तोड़ हमलों और पाषाण युग में भेजने जैसी खौफनाक धमकियों के बावजूद ईरान ने घुटने नहीं टेके। उसने न सिर्फ अमेरिकी हमलों का डटकर जवाब दिया बल्कि अपने आक्रामक रुख से अमेरिका को युद्धविराम की मेज पर आने के लिए मजबूर कर दिया। किसी भी छोटे देश द्वारा अमेरिका जैसी महाशक्ति को इस तरह टक्कर देना और उसे पीछे हटने पर मजबूर करना अपने आप में ईरान की एक बहुत बड़ी कूटनीतिक और रणनीतिक जीत है।
महाशक्ति की मजबूरी और फेस सेविंग
अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक कड़वा सच यह है कि जब कोई महाशक्ति किसी युद्ध में अपने लक्ष्य हासिल नहीं कर पाती और उसे पीछे हटना पड़ता है तो वह सीधे तौर पर अपनी हार स्वीकार नहीं कर सकती। इसे राजनीतिक भाषा में फेस सेविंग यानी अपनी साख बचाना कहते हैं। डोनाल्ड ट्रंप अपनी जनता और विपक्ष के सामने एक कमजोर राष्ट्रपति नहीं दिखना चाहते थे। इसलिए अमेरिका को युद्ध से बाहर निकलने के लिए एक बहाने की जरूरत थी। ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट खोलने की शर्त मान लेना अमेरिका के लिए वही बहाना बन गया। ट्रंप अब इसी एक शर्त को अपनी जीत का आवरण पहनाकर दुनिया के सामने पेश कर रहे हैं।
आर्थिक तबाही का डर
इस युद्धविराम के पीछे एक और बड़ी सच्चाई वैश्विक और अमेरिकी अर्थव्यवस्था है। युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही थीं जिसका सीधा असर अमेरिकी शेयर बाजार और वहां की घरेलू महंगाई पर पड़ रहा था। ट्रंप प्रशासन को यह भली भांति समझ आ गया था कि अगर युद्ध और खिंचा तो अमेरिका को एक भयंकर आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में युद्ध रोककर बाजार को स्थिर करना उनकी सबसे बड़ी मजबूरी थी जिसे वे अब अपनी सफलता बता रहे हैं।
सीधे शब्दों में कहें तो ईरान युद्ध में अमेरिका की कोई सैन्य जीत नहीं हुई है। अमेरिका एक महाशक्ति होने के नाते हार का ठप्पा लगाकर मैदान नहीं छोड़ सकता था इसलिए उसने ईरान से जलमार्ग खोलने की शर्त मनवाकर इसे आंशिक जीत का नाम दे दिया ताकि दुनिया के सामने उसकी बची खुची इज्जत कायम रहे। हकीकत यही है कि इस पूरे महायुद्ध में ईरान एक नई और मजबूत क्षेत्रीय ताकत बनकर उभरा है जिसने अमेरिका को अपने कदम पीछे खींचने पर मजबूर कर दिया।

