बरसाना की लठमार होली: लाठियों की तड़तड़ाहट शांत हुई, पर पीछे छोड़ गई प्रेम का वो अनूठा संदेश; आखिर क्यों दुनिया झुकती है ब्रज की इस लाठी के आगे

मथुरा/बरसाना: बरसाना की रंगीली गलियों में हुरियारों की ढाल और हुरियारिनों की लाठियों का शोर भले ही थम गया हो, लेकिन ब्रज की माटी में…

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मथुरा/बरसाना: बरसाना की रंगीली गलियों में हुरियारों की ढाल और हुरियारिनों की लाठियों का शोर भले ही थम गया हो, लेकिन ब्रज की माटी में रची-बसी इस परंपरा की गूँज आज भी फिजाओं में है। 26 फरवरी को लठमार होली का भव्य आयोजन संपन्न तो हो गया, लेकिन इस ‘प्रेम युद्ध’ की असलियत तब समझ आई जब देश-दुनिया से आए लाखों श्रद्धालुओं ने इस लाठी की मार में भी भक्ति का रस ढूंढा।


सिर्फ ‘मार’ है या सदियों का संस्कार?
लोग इसे महज एक खेल या तमाशा समझ सकते हैं, लेकिन बरसाना की लठमार होली उस सनातन संस्कृति की ‘नजीर’ है जहाँ स्त्री शक्ति का लोहा स्वयं कान्हा ने भी माना था। द्वापर युग से चली आ रही इस रस्म की पोल तब खुल गई जब आधुनिकता के दौर में भी नंदगांव के ग्वाले आज भी बरसाना की लाठियों के आगे खुशी-खुशी सिर झुकाते नजर आए। आखिर क्या है इस ‘लाठी-तंत्र’ का वो राज, जो इसे दुनिया की सबसे अनोखी होली बनाता है?

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पौराणिक हकीकत: जब कान्हा को होना पड़ा था ‘नतमस्तक’
ग्वालों की टोली और सखियों का घेरा: मान्यताओं के मुताबिक, जब नटखट कान्हा अपने सखाओं के साथ राधा रानी और उनकी सखियों को तंग करने बरसाना पहुँचते थे, तो गोपियां उन्हें सबक सिखाने के लिए लाठियां उठा लेती थीं।


प्रेम का दंड: आज भी जीवंत है वही परंपरा
नंदगांव के पुरुष (हुरियारे) ढाल लेकर आते हैं और बरसाना की महिलाएं (हुरियारिनें) उन पर प्रेमपूर्वक लाठियां भांजती हैं। जो पकड़ा जाता है, उसे सजा के तौर पर महिलाओं के कपड़े पहनकर नाचना पड़ता है—यह पुरुष सत्ता के अहंकार पर ‘भक्ति और प्रेम’ की जीत का सबसे बड़ा मजाक है।


विशेष आकर्षण: सिर्फ रंग नहीं, यहाँ ‘कौशल’ भी है
लाठी भांजने की कला: यह महज रस्म नहीं, बल्कि एक युद्ध कला भी है। हुरियारिनों का लाठी चलाने का तरीका और हुरियारों का ढाल से बचाव करना किसी पेशेवर मार्शल आर्ट से कम नहीं दिखता।


दुनिया भर से दस्तक: इस बार भी हजारों विदेशी सैलानियों की मौजूदगी ने यह साबित कर दिया कि ब्रज की यह होली सात समंदर पार भी अपनी चमक बिखेर रही है।


उत्सव बीत गया, हुड़दंग खत्म हुआ, लेकिन सवाल वही है—क्या हम इन परंपराओं को सिर्फ ‘फोटो खिंचवाने’ का जरिया बना रहे हैं? प्रशासन ने भारी भीड़ के बीच जो इंतजाम किए, उनकी कलई कई जगह खुलती दिखी। क्या हम अपनी धरोहरों को सुरक्षित और सुव्यवस्थित यात्रा का ‘मॉडल’ नहीं बना सकते? रस्म अदायगी तो हर साल होगी, पर जरूरत इस दिव्य परंपरा की मर्यादा और श्रद्धालुओं की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की है।