महाश्मशान की राख और महादेव का उल्लास: जानिए क्यों खास है काशी की ‘मसान वाली होली’

वाराणसी (काशी): पूरी दुनिया जहां लाल, पीले और हरे गुलाल से होली के रंग में रंगती है, वहीं मोक्ष की नगरी काशी में एक ऐसी…

Varanasi’s Masan Holi A Unique Celebration Where Shiva’s Ganas Play with Burning Pyre Ashes

वाराणसी (काशी): पूरी दुनिया जहां लाल, पीले और हरे गुलाल से होली के रंग में रंगती है, वहीं मोक्ष की नगरी काशी में एक ऐसी होली खेली जाती है जो जीवन के अंतिम सत्य यानी ‘मृत्यु’ को भी एक उत्सव बना देती है। वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर खेली जाने वाली ‘मसान की होली’ (Masan Holi) केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि शिव और उनके गणों के अटूट प्रेम का प्रतीक है।

शिव और अघोरियों का अद्भुत मिलन

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रंगभरी एकादशी के दिन भगवान शिव माता पार्वती का गौना कराकर काशी लाते हैं। उस दिन पूरा शहर गुलाल से बाबा का स्वागत करता है, लेकिन शिव के प्रिय गण—भूत, प्रेत, पिशाच, अघोरी और नागा साधु—उस उत्सव में शामिल नहीं हो पाते। अपने इन अनन्य भक्तों की इच्छा पूरी करने के लिए स्वयं महादेव अगले दिन महाश्मशान ‘मणिकर्णिका’ आते हैं और उनके साथ चिता की भस्म से होली खेलते हैं।

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काशी की मसान होली 2026: मणिकर्णिका घाट पर उड़ी चिता-भस्म

चिता की राख: डर नहीं, मोक्ष का श्रृंगार

आम तौर पर जिस चिता की राख से लोग दूरी बनाते हैं, मसान की होली में वही राख ‘अबीर’ बन जाती है। मणिकर्णिका घाट पर जलती चिताओं के बीच डमरू की गूँज और ‘हर-हर महादेव’ के उद्घोष के बीच जब राख हवा में उड़ती है, तो वह दृश्य रोंगटे खड़े कर देने वाला होता है। भक्त मानते हैं कि इस भस्म को शरीर पर मलने से साक्षात शिव का आशीर्वाद मिलता है।

इस परंपरा का गहरा आध्यात्मिक संदेश

मसान वाली होली हमें जीवन का सबसे बड़ा दर्शन सिखाती है—”मृत्यु ही अंतिम सत्य है और इससे डरना कैसा?” काशी में माना जाता है कि यहाँ मृत्यु भी मंगलकारी है। धधकती चिताओं के किनारे नाचते-गाते भक्त यह संदेश देते हैं कि आत्मा अजर-अमर है और अंततः सब कुछ पंचतत्व (राख) में ही विलीन होना है।

आधुनिक दौर में मसान होली का आकर्षण

आज यह परंपरा केवल अघोरियों तक सीमित नहीं रही है। अब देश-दुनिया से लाखों पर्यटक और फोटोग्राफर इस पल को कैमरे में कैद करने काशी पहुंचते हैं। 2026 में भी करीब 3 लाख से ज्यादा लोगों की मौजूदगी ने यह साबित किया कि पुरातन परंपराएं आज भी उतनी ही जीवंत हैं।

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