ब्रेन कैंसर से लड़ रहा था कर्मचारी, फिर भी कंपनी ने छुट्टी देने से किया इनकार; उसकी तकलीफ भरी दास्तान सुनकर दिल पिघल जाएगा

कई बार जिंदगी की सबसे बड़ी लड़ाई अस्पताल के कमरे में नहीं, बल्कि ऑफिस की कुर्सी पर बैठकर लड़ी जाती है। एक तरफ जानलेवा बीमारी…

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कई बार जिंदगी की सबसे बड़ी लड़ाई अस्पताल के कमरे में नहीं, बल्कि ऑफिस की कुर्सी पर बैठकर लड़ी जाती है। एक तरफ जानलेवा बीमारी से जूझता शरीर, दूसरी तरफ काम का दबाव और नियमों का बोझ। इलाज के समय इंसान को आराम, सहारे और समझ की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, लेकिन जब वही समय मांगना भी मुश्किल कर दिया जाए, तो हालात और ज्यादा दर्दनाक हो जाते हैं। यही कहानी है टायलर वेल्स की, जिन्होंने कैंसर के इलाज के लिए कुछ छुट्टियां तक न मिलने पर लाखों की सैलरी वाली अपनी “सिक्स-फिगर जॉब” छोड़ दी। टायलर का यह कदम अब कॉर्पोरेट सिस्टम और इंसानियत की असलियत पर बड़ा सवाल बनकर खड़ा है।

टायलर एक डिजिटल प्रोफेशनल थे और एक एडवरटाइजिंग एजेंसी में अच्छी पोजीशन पर काम करते थे। इसी दौरान उन्हें ब्रेन कैंसर का पता चला और कीमोथेरेपी की लंबी, थकाने वाली प्रक्रिया शुरू हुई। बीमारी के बावजूद वह काम करते रहे, लेकिन जैसे-जैसे इलाज आगे बढ़ा, उनकी हालत कमजोर होती गई। उन्होंने हर महीने कुछ दिनों की छुट्टी मांगी, ताकि इलाज के बाद शरीर को थोड़ा आराम मिल सके। यह एक सामान्य और वाजिब मांग थी, लेकिन कंपनी ने इसे नजरअंदाज कर दिया।


कागजों पर कंपनी “अनलिमिटेड पेड टाइम ऑफ” का दावा करती थी। नीति के अनुसार कर्मचारी जरूरत पड़ने पर छुट्टी ले सकते थे।

लेकिन टायलर के मुताबिक, जब उन्होंने इलाज के दौरान छुट्टियां मांगी, तो इसे पॉलिसी का “गलत इस्तेमाल” बताया गया। उन्हें कहा गया कि पेड लीव नहीं दी जा सकती और अगर छुट्टी चाहिए तो बिना वेतन की मेडिकल लीव लें। हल्के काम की उनकी छोटी मांग भी ये कहकर ठुकरा दी गई कि कंपनी इसमें कोई छूट नहीं दे सकती। थकान, मानसिक दबाव और असहयोग के बीच आखिरकार टायलर ने नौकरी छोड़ने का फैसला किया।

जब उन्होंने सोशल मीडिया पर अपना अनुभव साझा किया, तो हजारों लोगों ने प्रतिक्रिया दी। कई लोगों ने लिखा कि बीमारी, तनाव या पारिवारिक संकट के समय उन्हें भी ऑफिस से किसी तरह का सहारा नहीं मिला। यह मामला सिर्फ एक नौकरी छोड़ने का नहीं रहा, बल्कि कार्यस्थल की संवेदनशीलता का बड़ा मुद्दा बन गया। टायलर का कहना है कि बीमारी के दौरान इंसान पहले ही डर, दर्द और आर्थिक तनाव से परेशान होता है। ऐसे में बिना वेतन छुट्टी का बोझ हालात और मुश्किल कर देता है। उनकी कहानी अब यह सवाल खड़ा करती है कि क्या कंपनियों की नीतियां वास्तव में कर्मचारियों के लिए हैं, या सिर्फ दिखावे के लिए कागजों में लिखी जाती हैं।

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