हिमालय को अब स्वच्छ जल का सबसे ज्यादा भरोसेमंद स्रोत माना जाता रहा है लेकिन एक ताजा वैज्ञानिक अध्ययन में इस धारणा को गलत बताया गया।
बताया जा रहा है की खतरनाक माइक्रोप्लास्टिक हिमालय जल स्रोत में पाया गया है। यमुनोत्री ग्लेशियर के समीप उद्गम स्थल पर भी माइक्रो प्लास्टिक कणो की मौजूदगी दर्ज की गई जो हिमालय पर्यावरण के लिए काफी गंभीर चेतावनी है।
यमुना में माइक्रो प्लास्टिक प्रदूषण ग्लेशियर से लेकर निकले हिमालय की तलहटी में फैल गया है। पर्वतारोही ट्रैक्टर तीर्थ यात्रियों के द्वारा प्रयोग किए जाने वाले जूते कपड़े प्लास्टिक उत्पाद और मानसून हवाओं के कारण माइक्रो डस्ट पार्टिकल हिमालय को प्रभावित कर रहे हैं।
शोधकर्ताओं ने यमुना के 170 किलोमीटर लंबे हिमालयी हिस्से का अध्ययन किया, जो यमुनोत्री ग्लेशियर से शुरू होकर हथिनी कुंड बैराज तक फैला है। इस पूरे कॉरिडोर में पानी और तलछट दोनों में माइक्रोप्लास्टिक की व्यापक मौजूदगी पाई गई। यमुना में माइक्रोप्लास्टिक का दबाव मानूसन में चरम पर होता है। पर्यटन गतिविधियां, अपर्याप्त अपशिष्ट प्रबंधन इसके कारण हैं।
यह शोध दून विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभाग के एचओडी प्रोफेसर सुरेंद्र सिंह सूथर के निर्देशन में किया गया है। यह अध्ययन हिमालयी नदियों, ग्लेशियर जल, सिंथेटिक टैक्सटाइल, प्लास्टिक की बोतलें, शहरी प्रदूषण, प्लास्टिक रिसाइक्लिंग और रिसाइकिल्ड प्लास्टिक पैकेजिंग पर केंद्रित है।
यमुना में प्लास्टिक पॉलिमर
पॉलीइथाइलीन(पीई), पॉलीप्रोपाइलीन (पीपी), पॉलीस्टाइनिन (पीएस), पॉलीइथाइलीन टेरेफ्थेलेट (पीईटी), पॉलीविनाइल क्लोराइड (पीवीसी), पॉलीकार्बोनेट (पीसी), पॉलीयुरेथेन (पीयू), पॉलीमाइड(पीए), पीएमएमए, पीआईएफई और नाइट्राइल, कम घनत्व वाले पीई और पीपी सबसे अधिक मात्रा में पाए गए।
दून विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के विभाग अध्यक्ष का कहना है कि हिमालय नदियां स्रोत पर भी स्वच्छ नहीं है तत्काल नीतिगत हस्तक्षेप सख्त अपशिष्ट प्रबंधन, पर्यटन और शहरी क्षेत्रों में प्लास्टिक नियंत्रण न हुआ तो हिमालयी जलस्रोतों में माइक्रोप्लास्टिक गंभीर संकट साबित होगा।
शोध की प्रमुख खोजें
यमुना में 20 माइक्रोमीटर से 5 माइक्रोमीटर तक के माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए।
सबसे छोटे कण (20-106 माइक्रो मीटर) प्लास्टिक के अत्यधिक क्षरण का संकेत देते हैं।
बड़े कण (500 माइक्रोन से-5 एमएम) लगातार टूटने वाले प्लास्टिक कचरे को दर्शाते हैं।
इतने छोटे कण जलीय जीवों द्वारा आसानी से निगले जा सकते हैं, जिससे फूड-चेन का खतरा बढ़ता है।
