विवेकानंद पर्वतीय कृषि संस्थान में आयोजित हुआ 52वां कृषि विज्ञान मेला,तीन नई बीज प्रजातियों का लोकार्पण किया

आईसीएआर से सम्बद्ध विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा के प्रयोगात्मक प्रक्षेत्र, हवालबाग में शनिवार को ’खेती में नवीनता – पोषण में श्रेष्‍ठता’ थीम पर…

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आईसीएआर से सम्बद्ध विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा के प्रयोगात्मक प्रक्षेत्र, हवालबाग में शनिवार को ’खेती में नवीनता – पोषण में श्रेष्‍ठता’ थीम पर आधारित 52वें कृषि विज्ञान मेले का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम का शुभारम्भ राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम तदुपरान्त‍ परिषद गीत से हुआ । कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि डॉ. मांगी लाल जाट सचिव, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग, भारत सरकार एवं महानिदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली द्वारा किया गया। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथियों के रूप में डॉ. देवेन्द्र कुमार यादव, उप महानिदेशक (फसल विज्ञान) और डॉ. राजबीर सिंह, उप महानिदेशक (कृषि विस्तार), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली उपस्थित रहे। इनके अतिरिक्‍त डॉ. यशपाल सिंह मलिक, संयुक्त निदेशक, मुक्तेश्वर परिसर, भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, मुक्तेश्वर एवं डॉ. अमित पांडे, निदेशक, शीतजल मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, भीमताल ने मेले में प्रतिभाग किया।
मेले की गतिविधियों का औपचारिक आरंभ प्रातः 10:00 बजे कृषकों के प्रक्षेत्र भ्रमण के साथ हुआ, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों से आए किसानों ने संस्थान द्वारा विकसित की जा रही उन्नत फसलों और नवीन कृषि तकनीकों का प्रत्यक्ष अवलोकन किया।
मुख्य अतिथि ने ‘शताब्दी महिला छात्रावास’ का शिलान्यास भी किया।
संस्थान के निदेशक डॉ. लक्ष्‍मी कान्‍त ने अपने स्वागत भाषण में सभी अतिथियों और कृषकों का अभिनंदन करते हुए संस्थान की उपलब्धियों और पर्वतीय किसानों के कल्याण हेतु किए जा रहे प्रयासों का विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि संस्थान अब तक 200 से अधिक उन्नत प्रजातियां विकसित कर चुका है जिसमें उनके द्वारा विशेष रूप से बायोफोर्टिफाइड मक्का की किस्मों ‘वी.एल. त्रिपोषी’ और ‘वी.एल. सुपोषिता’ की सफलता का उल्लेख किया जो पोषण सुरक्षा की दृष्टि से मील का पत्थर हैं। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि संस्थान ने उर्वरकों की खपत कम करने हेतु विशेष बैक्टीरिया खोजा है और मडुवा ट्रांसप्लांटर जैसे यंत्रों से खेती को सुगम बनाया है। उन्‍होंने अपने वक्‍तव्‍य में यह भी कहा कि हींग और किनोआ जैसी नई फसलों पर किए जा रहे प्रयोगों को भविष्य की आय का साधन बताया गया।

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उन्होंने कहा कि इस मेले में में चीन सीमा से सटे सुदूर गांवों के किसानों सहित कुल 1129 कृषकों ने पंजीकरण कराया है।


मुख्य अतिथि डॉ. मांगी लाल जाट, माननीय सचिव, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग, भारत सरकार एवं महानिदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली ने संस्थान के 100 वर्षों के गौरवशाली इतिहास और नई प्रजातियों के विकास की उपलब्धि के लिए वैज्ञानिकों को बधाई दी।

उन्होंने विशेष रूप से ‘वी.एल. त्रिपोषी’ और ‘सुपोषिता’ जैसी बायोफोर्टिफाइड मक्का किस्मों को पोषण सुरक्षा की दिशा में क्रांतिकारी कदम बताया।

उनके अनुसार, उर्वरकों की बचत करने वाले बैक्टीरिया और आधुनिक यंत्रों का विकास ‘कम लागत, अधिक उत्पादन’ के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक होगा। उन्‍होंने ने अपने संबोधन में उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग से मृदा स्वास्थ्य और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों के प्रति सचेत किया और आगामी खरीफ सीजन से पूर्व देशभर में, विशेषकर अत्यधिक उर्वरक खपत वाले जिलों में, ‘उर्वरकों के संतुलित उपयोग पर गहन अभियान’ का शुभारम्‍भ किया।


डॉ. राजबीर सिंह, माननीय उप महानिदेशक (कृषि विस्तार), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली ने अपने संबोधन में पर्वतीय कृषि के विकास में विस्तार शिक्षा और तकनीकी हस्तांतरण की महत्वपूर्ण भूमिका पर बल दिया।

उन्होंने संस्थान द्वारा विकसित तकनीकों की सराहना करते हुए पर्वतीय कृ‍षकों से कीवी, लैमन ग्रास, मसाले इत्‍यादि फसलों की खेती करने पर बल दिया और कहा कि ये नवाचार किसानों की जमीनी समस्याओं का वास्तविक समाधान हैं।

उनके अनुसार, कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से नई प्रजातियों को सुदूरवर्ती क्षेत्रों तक पहुँचाना संस्थान की एक बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने कृषक समुदायों, विशेषकर महिला किसानों के सशक्तिकरण हेतु श्रम में कमी लाने वाले कृषि यंत्रों के उपयोग को बढ़ाने की आवश्यकता जताई।

डॉ. सिंह ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए किसानों को बाजार से जोड़ने और उनके उत्पादों के उचित मूल्य दिलाने के प्रयासों पर भी चर्चा की। उन्‍होंने अपने सम्‍बोधन में जलवायु परिवर्तन के दौर में टिकाऊ खेती और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर भी विशेष ध्यान दिया।


मेले के दौरान प्रगतिशील किसान मंजू देवी, सरदार सिंह, चन्‍दन सिंह, संतोष कुमार, चम्‍पा देवी, लाल सिंह कठायत हेमा देवी, खीम सिंह, श्‍याम सिंह, शारदा देवी एवं शालिनी देवी को पुरस्कृत किया गया।


इस अवसर पर संस्थान में चल रही अनुसूचित जाति उपयोजना के अन्तर्गत अल्‍मोड़ा व बागेश्‍वर जनपद के विभिन्‍न गांवों से आए कृषकों को एग्रीकैनन, वी एल कुरमुला ट्रैप, वी एल मंडुआ थ्रैशर, वी एल पॉलीटनल एवं पावर वीडर तथा जनजातीय उपयोजना के अर्न्‍तगत पावर वीडर ग्राम धनपौ, लखवाड़ कालसी ब्‍लॉक, देहरादून एवं का वितरण किया गया।

मुख्य अतिथि एवं विशिष्ट अतिथियों द्वारा संस्थान की प्रजातियों वील त्रिपोषी, वी एल सुपोषिता, वी एल मधुरिमा, वी.एल. मडुवा 410 का लोकार्पण किया गया।

इसके अतिरिक्त संस्थान के प्रकाशनों नामत: पर्वतीय कृषि दर्पण, पर्वतीय क्षेत्रों की महत्वपूर्ण फसलों की उन्नत किस्मों हेतु प्रबंधन कृषि पद्धतियाँ, उत्तराखंड की पारंपरिक फसल भट (काली सोयाबीन) के मूल्य वर्धित उत्पाद एवं पर्वतीय क्षेत्रों में दलहनी मटर की वैज्ञानिक खेती का विमोचन किया गया।


किसान मेले में आयोजित प्रदर्शनी में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनेक संस्थानों, कृषि विज्ञान केन्द्रों एवं सरकारी तथा गैर सरकारी संस्थानों द्वारा प्रतिभाग किया गया एवं लगभग 40 प्रदर्शनियाँ लगायी गयी। इस अवसर पर विभिन्न संस्थानों एवं विभागों के वैज्ञानिक एवं अधिकारीगणों के अतिरिक्‍त 10 जिलों से आये लगभग 1129 कृषक भी उपस्थित थे।

कृषि विज्ञान मेले में कृषक गोष्ठी का संचालन डॉ. कामिनी बिष्‍ट, वरिष्‍ठ वैज्ञानिक एवं कार्यक्रम का संचालन डा. अनुराधा भारतीय तथा श्रीमती निधि सिंह एवं धन्यवाद प्रस्ताव डा. निर्मल कुमार हेडाऊ, प्रभागाध्यक्ष, फसल सुधार द्वारा किया गया।

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